|
| |
| |
श्लोक 3.17.29  |
स एवमुत्सिक्तमदेन विद्विषा
दृढं प्रलब्धो भगवानपां पति: ।
रोषं समुत्थं शमयन् स्वया धिया
व्यवोचदङ्गोपशमं गता वयम् ॥ २९ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| इस अत्यंत दंभी शत्रु द्वारा इस प्रकार उपहास किए जाने पर जल के पूज्य स्वामी को क्रोध तो आया किंतु तर्क के बल पर उन्होंने उस क्रोध को पी लिया और इस प्रकार उत्तर दिया - हे प्रिय, युद्ध के लिए अत्यधिक बूढ़ा हो जाने के कारण अब मैं युद्ध से दूर रहता हूँ। |
| |
| इस अत्यंत दंभी शत्रु द्वारा इस प्रकार उपहास किए जाने पर जल के पूज्य स्वामी को क्रोध तो आया किंतु तर्क के बल पर उन्होंने उस क्रोध को पी लिया और इस प्रकार उत्तर दिया - हे प्रिय, युद्ध के लिए अत्यधिक बूढ़ा हो जाने के कारण अब मैं युद्ध से दूर रहता हूँ। |
| ✨ ai-generated |
| |
|