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bhagavat 3.17.23: अपने सामने पहले सत्ता पाकर नशे में चूर इंद्र और अन्य देवों को न देखकर और यह देखकर कि उसकी ताकत के सामने वे सभी गायब हो गए हैं, उस दैत्यराज ने गहरी हुंकार भरी।   |   bhagavat अध्याय 3.17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय   ।   bhagavat स्कन्ध 3: यथास्थिति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.17.23 
स वै तिरोहितान् दृष्ट्वा महसा स्वेन दैत्यराट् ।
सेन्द्रान्देवगणान् क्षीबानपश्यन् व्यनदद् भृशम् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
अपने सामने पहले सत्ता पाकर नशे में चूर इंद्र और अन्य देवों को न देखकर और यह देखकर कि उसकी ताकत के सामने वे सभी गायब हो गए हैं, उस दैत्यराज ने गहरी हुंकार भरी।
 
Not finding Indra and the other gods, who were intoxicated with their power, in front of him and seeing that they had all hidden themselves before his power, the demon king roared loudly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)