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श्लोक 3.17.23  |
स वै तिरोहितान् दृष्ट्वा महसा स्वेन दैत्यराट् ।
सेन्द्रान्देवगणान् क्षीबानपश्यन् व्यनदद् भृशम् ॥ २३ ॥ |
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| अनुवाद |
| अपने सामने पहले सत्ता पाकर नशे में चूर इंद्र और अन्य देवों को न देखकर और यह देखकर कि उसकी ताकत के सामने वे सभी गायब हो गए हैं, उस दैत्यराज ने गहरी हुंकार भरी। |
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| अपने सामने पहले सत्ता पाकर नशे में चूर इंद्र और अन्य देवों को न देखकर और यह देखकर कि उसकी ताकत के सामने वे सभी गायब हो गए हैं, उस दैत्यराज ने गहरी हुंकार भरी। |
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