मनोवीर्यवरोत्सिक्तमसृण्यमकुतोभयम् ।
भीता निलिल्यिरे देवास्तार्क्ष्यत्रस्ता इवाहय: ॥ २२ ॥
अनुवाद
उसके अंदर के हौसले, शारीरिक शक्ति और ब्रह्मा द्वारा मिले वरदान ने उसे डींगमार बना दिया था। उसे अपनी मृत्यु का किसी से भी डर नहीं था और उसे कोई भी नियंत्रित नहीं कर पाता था। इसलिए, देवता उसे देखकर घबरा जाते थे और खुद को ऐसे ही छिपा लेते थे जैसे गरुड़ के भय से सांप छिप जाते हैं।
His morale, physical strength and the boon given by Brahma had made him arrogant. He neither feared death from anyone nor was there any control over him. Therefore, the gods used to get scared on seeing him and used to hide themselves in the same way as snakes hide in fear of Garuda.
तात्पर्य
असुर सामान्यतः सशक्त शरीर के होते हैं, जैसा कि यहां वर्णित है, और इसलिए उनकी मानसिक स्थिति बहुत अच्छी होती है, और उनकी वीरता भी असाधारण होती है। हिरण्यकश्य और हिरण्यकशिपु को यह वरदान प्राप्त था कि उन्हें इस ब्रह्मांड के भीतर किसी भी अन्य जीवित प्राणी द्वारा मारा नहीं जाएगा, वे लगभग अमर थे, और इस प्रकार वे पूर्ण रूप से निडर थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥