चक्रे हिरण्यकशिपुर्दोर्भ्यां ब्रह्मवरेण च ।
वशे सपालाँल्लोकांस्त्रीनकुतोमृत्युरुद्धत: ॥ १९ ॥
अनुवाद
तीनों लोकों में सबसे बड़ा पुत्र हिरण्यकशिपु किसी से भी अपनी मौत से नहीं डरता था क्योंकि उसे भगवान ब्रह्मा का आशीर्वाद प्राप्त था। इस आशीर्वाद के कारण वो बहुत ही बड़ा अहंकारी बन गया था और तीनों लोकों को अपने वश में करने में सफल हो गया था।
The eldest son Hiranyakashipu had no fear of death from anyone in the three worlds because he had received a boon from Brahma. Due to this boon, he had become very arrogant and proud and was capable of subjugating the three worlds.
तात्पर्य
जैसा कि बाद के अध्यायों में बताया जाएगा, हिरण्यकशिपु ब्रह्मा को संतुष्ट करने और अमरता का वरदान प्राप्त करने के लिए भीषण तप और साधना की। वास्तव में, भगवान ब्रह्मा के लिए भी किसी को अमर होने का वरदान देना असंभव है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से हिरण्यकशिपु को यह वरदान प्राप्त हो गया कि इस भौतिक जगत में कोई भी उसे नहीं मार पाएगा। दूसरे शब्दों में, क्योंकि वह मूल रूप से वैकुण्ठ के निवास से आया था, उसे इस भौतिक जगत में किसी के द्वारा भी मारा नहीं जाना था। भगवान ने स्वयं प्रकट होकर उसे मारने की इच्छा की। कोई भी अपने ज्ञान में भौतिक उन्नति पर बहुत गर्व कर सकता है, लेकिन वह भौतिक अस्तित्व के जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारी के चार सिद्धांतों से प्रतिरक्षित नहीं हो सकता। लोगों को यह सिखाना भगवान की योजना थी कि हिरण्यकशिपु भी, जो इतना शक्तिशाली और मजबूत था, अपने जीवन की नियत अवधि से अधिक नहीं जी सकता था। कोई हिरण्यकशिपु जितना मजबूत और गर्वित बन सकता है और अपने नियंत्रण में तीनों लोकों को ला सकता है, लेकिन जीवन को शाश्वत रूप से जारी रखने या विजय प्राप्त की लूट को हमेशा के लिए रखने की कोई संभावना नहीं है। इतने सम्राट सत्ता में आए हैं, और अब वे गुमनामी में खो गए हैं; यह दुनिया का इतिहास है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥