श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.17.16 
तावादिदैत्यौ सहसा व्यज्यमानात्मपौरुषौ ।
ववृधातेऽश्मसारेण कायेनाद्रिपती इव ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
पुराने ज़माने में आए ये दोनों असुर कुछ ही समय में अपनी असाधारण शारीरिक विशेषताओं के लिए जाने जाने लगे थे; उनके शरीर इस्पात की तरह कड़े थे और वो दो बड़े पहाड़ों की तरह बढ़ने लगे थे।
 
These two demons that appeared in ancient times soon started showing unusual characteristics in their bodies, their body structures were like steel and they started growing like two huge mountains.
तात्पर्य
संसार में पुरुषों के दो वर्ग होते हैं: एक को असुर कहा जाता है, और दूसरे को देवता कहा जाता है। देवता स्वयं को मानव समाज के आध्यात्मिक उत्थान में संलग्न करते हैं, जबकि असुर भौतिक और भौतिक उत्थान में संलग्न रहते हैं। दिति से उत्पन्न दो राक्षसों ने अपने शरीरों को लोहे के फ्रेम की तरह मजबूत बनाना शुरू कर दिया, और वे इतने लंबे थे कि वे बाहरी अंतरिक्ष को छूते हुए लग रहे थे। उन्हें मूल्यवान आभूषणों से सजाया गया था, और उन्हें लगा कि जीवन में यही सफलता है। मूल रूप से यह योजना बनाई गई थी कि वैकुंठ के दो द्वारपाल जय और विजय इस भौतिक जगत में जन्म लेंगे, जहाँ, ऋषियों के श्राप के कारण, उन्हें भगवान के प्रति हमेशा क्रोधित रहने का अभिनय करना था। आसुरी व्यक्तियों के रूप में, वे इतने क्रोधित हो गए कि वे भगवान के प्रति चिंतित नहीं थे, बल्कि केवल शारीरिक सुख और शारीरिक उत्थान से चिंतित थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)