श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.17.14 
ग्रहान् पुण्यतमानन्ये भगणांश्चापि दीपिता: ।
अतिचेरुर्वक्रगत्या युयुधुश्च परस्परम् ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
मंगल और शनि जैसे क्रूर ग्रह बृहस्पति, शुक्र और अनेक शुभ नक्षत्रों को पीछे छोड़कर तेजी से चमकने लगे। टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलने के कारण ग्रहों में आपस में टकराव होने लगा।
 
Cruel planets like Mars and Saturn started shining brightly, surpassing Jupiter, Venus and many auspicious stars. Due to moving in zigzag paths, the planets started colliding with each other.
तात्पर्य
संपूर्ण ब्रह्मांड प्रकृति के तीनों गुणों के अधीन चल रहा है। वे जीव जो अच्छे हैं उन्हें पवित्र जाति - पवित्र भूमि, पवित्र पेड़ आदि कहा जाता है। यह ग्रहों के साथ भी ऐसी ही है; कई ग्रहों को पवित्र माना जाता है, और अन्य को अपवित्र माना जाता है। शनि और मंगल को अपवित्र माना जाता है। जब पवित्र ग्रह बहुत तेज चमकते हैं, तो यह एक शुभ संकेत होता है, लेकिन जब अशुभ ग्रह बहुत तेज चमकते हैं, तो यह एक बहुत अच्छा संकेत नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)