श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.15.7 
तेषां सुपक्‍वयोगानां जितश्वासेन्द्रियात्मनाम् ।
लब्धयुष्मत्प्रसादानां न कुतश्चित्पराभव: ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग साँस-प्रक्रिया को साधकर मन और इन्द्रियों को काबू में कर लेते हैं और इस तरह से अनुभवी प्रौढ़ योगी बन जाते हैं, उनकी इस जगत में हार नहीं होती। ऐसा इसलिए है कि योग में इस तरह की सिद्धि के कारण उन्हें आपकी कृपा प्राप्त हो जाती है।
 
Those who control their mind and senses by mastering their breathing process and thus become experienced and mature Yogis are never defeated in this world. This is because, due to such perfection in Yoga, they have attained your grace.
तात्पर्य
यहाँ योगिक क्रियाओं के उद्देश्य को समझाया गया है। यह कहा गया है कि एक अनुभवी साधक साँस लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करके इंद्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करता है। इसलिए, साँस लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करना योग का अंतिम उद्देश्य नहीं है। योगिक क्रियाओं का वास्तविक उद्देश्य मन और इंद्रियों को वश में करना है। जिस किसी का ऐसा नियंत्रण होता है उसे एक अनुभवी, परिपक्व साधक योगी समझा जाना चाहिए। यहाँ यह संकेत दिया गया है कि एक योगी जिसका मन और इंद्रियों पर नियंत्रण है, उसे प्रभु का वास्तविक आशीर्वाद प्राप्त होता है, और उसमें कोई भय नहीं होता है। दूसरे शब्दों में, जब तक कोई मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं हो जाता, तब तक वह सर्वोच्च प्रभु की दया और आशीर्वाद प्राप्त नहीं कर सकता। यह वास्तव में तभी संभव है जब कोई पूरी तरह से कृष्णभावनाभावित हो जाता है। एक व्यक्ति जिसकी इंद्रियाँ और मन हमेशा प्रभु की पारलौकिक सेवा में लगा रहता है, उसके पास सांसारिक गतिविधियों में शामिल होने की कोई संभावना नहीं होती है। प्रभु के भक्त ब्रह्मांड में कहीं भी पराजित नहीं होते। यह कहा गया है, नारायण-पराह सर्वे: जो नारायण-पर, या भगवान के परम व्यक्तित्व के भक्त हैं, वे कहीं भी डरते नहीं हैं, चाहे उन्हें नरक भेजा जाए या स्वर्ग में पदोन्नत किया जाए (भागवत 6.17.28)।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)