हे प्रभु, हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि जब तक हमारे हृदय और मन आपके चरणकमलों की सेवा में समर्पित रहें, हमारी वाणी आपके गुणगान से सुगंधित बनी रहे, और हमारे कान आपके दिव्य नाम और लीलाओं के श्रवण से तृप्त रहें, तब तक आप हमें जीवन की किसी भी कठिन परिस्थिति में जन्म दे सकते हैं।
O Lord, we pray that as long as our hearts and minds are engaged in the service of Your feet, may our words (by narrating Your actions) become beautiful like the Tulsi leaves offered at Your feet, and may our ears be filled with the chanting of Your transcendental qualities, may You cause us to be born in any hellish state of life.
तात्पर्य
भगवान की अपनी भव्यता के कारण अन्य दो भक्तों को शाप देने के कारण अब चारों ऋषि भगवान को अपनी विनम्रता अर्पित करते हैं। जय और विजय, वे दो द्वारपाल जिन्होंने उन्हें वैकुंठ ग्रह में प्रवेश करने से रोक दिया था, निश्चित रूप से अपराधी थे, लेकिन वैष्णवों के रूप में, चारों ऋषियों को उन्हें क्रोध में शापित नहीं करना चाहिए था। घटना के बाद, उन्हें होश आ गया कि उन्होंने भगवान के भक्तों को शाप देकर गलत किया है, और उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि नरक जैसी स्थिति में भी उनका मन भगवान नारायण के चरण कमलों की सेवा में लगे रहने से विचलित न हो। जो लोग भगवान के भक्त हैं वे जीवन की किसी भी स्थिति से नहीं डरते, बशर्ते कि भगवान की सेवा में निरंतर लगे रहें। नारायण-परा या भगवान नारायण के भक्तों के बारे में कहा जाता है, ना कुतश्चन बिभ्यति (भाग। 6.17.28)। वे नरक जैसी स्थिति में प्रवेश करने से नहीं डरते, क्योंकि वे भगवान की दिव्य प्रेममय सेवा में लगे हुए हैं, इसलिए उनके लिए स्वर्ग या नरक एक ही है। भौतिक जीवन में स्वर्ग और नरक दोनों एक ही जैसे हैं क्योंकि वे भौतिक हैं; किसी भी स्थान पर भगवान की सेवा में कोई जुड़ाव नहीं है। इसलिए जो लोग भगवान की सेवा में लगे हुए हैं वे स्वर्ग और नरक के बीच कोई अंतर नहीं देखते हैं; केवल भौतिकवादी हैं जो एक को दूसरे से अधिक पसंद करते हैं। इन चार भक्तों ने भगवान से प्रार्थना की कि यद्यपि वे भक्तों को शाप देने के कारण नरक जा सकते हैं, परन्तु वे भगवान की सेवा को न भूलें। भगवान की दिव्य प्रेममय सेवा तीन तरीकों से निभाई जाती है - शरीर से, मन से और शब्दों से। यहाँ ऋषि प्रार्थना करते हैं कि उनके शब्द हमेशा सर्वोच्च भगवान की महिमा करने में लगे रहें। व्यक्ति अलंकृत भाषा के साथ बहुत ही अच्छे से बोल सकता है या नियंत्रित व्याकरणिक प्रस्तुति में विशेषज्ञ हो सकता है, लेकिन यदि उस व्यक्ति के शब्द भगवान की सेवा में नहीं लगे हैं, तो उनमें कोई स्वाद और कोई वास्तविक उपयोग नहीं है। तुलसी के पत्तों का उदाहरण यहाँ दिया गया है। तुलसी का पत्ता औषधीय या एंटीसेप्टिक दृष्टिकोण से भी बहुत उपयोगी है। इसे पवित्र माना जाता है और इसे भगवान के चरण-कमलों में अर्पित किया जाता है। तुलसी के पत्ते में कई अच्छे गुण होते हैं, लेकिन अगर इसे भगवान के चरण-कमलों में अर्पित नहीं किया जाता, तो तुलसी का कोई महत्व या महत्त्व नहीं हो सकता। इसी तरह, कोई व्यक्ति अलंकारिक या व्याकरणिक दृष्टिकोण से बहुत अच्छी तरह से बोल सकता है, जिसे भौतिकवादी दर्शकों द्वारा बहुत सराहा जा सकता है, लेकिन यदि किसी के शब्द भगवान की सेवा में नहीं दिए जाते हैं, तो वे बेकार हैं। कानों के छेद बहुत छोटे होते हैं और किसी भी तुच्छ ध्वनि से भरे जा सकते हैं, तो वे भगवान के गुणगान के रूप में इतना बड़ा कंपन कैसे प्राप्त कर सकते हैं? इसका उत्तर यह है कि कानों के छेद आकाश की तरह हैं। जैसे आकाश कभी नहीं भर सकता है, कान की गुणवत्ता ऐसी होती है कि कोई विभिन्न प्रकार के कंपन डालता रह सकता है, फिर भी वह अधिक से अधिक कंपन प्राप्त करने में सक्षम होता है। एक भक्त नरक में जाने से नहीं डरता अगर उसे लगातार भगवान की महिमा सुनने का मौका मिले। यह हरि कृष्ण, हरि कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरि हर / हर राम, हर राम, राम राम, हर हर का जाप करने का लाभ है। कोई भी स्थिति में रखा जा सकता है, लेकिन भगवान उसे हरि कृष्ण का जाप करने का विशेषाधिकार देते हैं। जीवन की किसी भी स्थिति में, यदि कोई व्यक्ति जप करता रहता है तो वह कभी दुखी नहीं होगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥