वे लोग जो वस्तुओं को उनके स्वरूप में समझने में अत्यंत कुशल और सबसे अधिक बुद्धिमान होते हैं, वे अपने आप को भगवान के शुभ कार्यों और उनके लीलाओं की कथाओं को सुनने में लगाते हैं, जो किर्तन और श्रवण के योग्य होती हैं। ऐसे लोग सर्वोच्च भौतिक वरदान, अर्थात् मुक्ति की भी परवाह नहीं करते, स्वर्गलोक के भौतिक सुख जैसे कम महत्वपूर्ण वरदानों के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं।
Those persons who are most adept and most intelligent in understanding things as they are engage themselves in listening to the stories of the auspicious activities of the Lord and His pastimes, which are worthy of recitation and hearing. Such persons do not even care for the highest material benediction, that is, liberation, to say nothing of less important benedictions such as the material pleasures of the heavenly planets.
तात्पर्य
भगवान के भक्तों का आनंद भौतिक सुख से बिल्कुल भिन्न होता है, जो कम बुद्धिमान लोग भोगते हैं। भौतिक दुनिया में कम बुद्धिमान व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के नाम से चार सिद्धांतों में उलझे रहते हैं। अमूमन वे लोगों को धार्मिक कर्मकांडों में भाग लेना पसंद होता है, जिससे कुछ भौतिक लाभ हो सके- जिनका मुख्य उद्देश्य इंद्रियों की संतुष्टि होती है। जब वे अपनी अधिकतम इंद्रिय सुख की इच्छा की पूर्ति में विफल या भ्रमित हो जाते हैं, तो वे सर्वोच्च के साथ एक होने का प्रयास करते हैं, जो उनके विचार से मुक्ति या स्वतंत्रता है। पांच प्रकार कि मुक्ति हैं, जिनमें सबसे कम महत्वपूर्ण सायुज्य मुक्ति है, यानी कि सर्वोच्च के साथ एक हो जाना। भक्तगण ऐसी मुक्ति की परवाह नहीं करते क्योंकि वे वास्तव में बुद्धिमान होते हैं। और न ही वे अन्य चार प्रकार की मुक्ति को स्वीकार करने को इच्छुक होते हैं, जैसे कि भगवान के साथ उसी ग्रह में रहना, भगवान के साथ एक साथी के रूप में साथ रहना, वैसी ही सम्पन्नता पाना या वैसी ही शारीरिक बनावट पाना। वे केवल सर्वोच्च भगवान और उनकी शुभ गतिविधियों का महिमामंडन करने में ही व्यस्त रहते हैं। शुद्ध भक्ति सेवा श्रवणं कीर्तन है। शुद्ध भक्त, जो कि भगवान की जय-जयकार सुनने और जप करने में आनंद लेते हैं, उन्हें किसी भी प्रकार की मुक्ति की परवाह नहीं होती है; अगर उन्हें पांचों मुक्तियां भी दे दी जाएं तो भी वे उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे, जैसा कि भगवतं के तीसरे कांड में लिखा है। भौतिकवादी व्यक्ति स्वर्ग में सुख-सुविधाओं का आनंद पाने के लिए तरसते हैं, लेकिन भक्त ऐसे भौतिक सुखों को तुरंत ही ठुकरा देते हैं। भक्त इंद्र के पद को भी स्वीकार नहीं करना चाहता है। भक्त जानता है कि कोई भी भौतिक पद एक निश्चित बिंदु पर मिट जाएगा। अगर कोई इंद्र, चंद्र या किसी भी अन्य देवी-देवता के पद को भी प्राप्त कर ले, तो भी उसे एक निश्चित स्तर पर भंग हो जाना होगा। भक्त को क्षणभंगूर सुखों में कोई रुचि नहीं है। वैदिक शास्त्रों से समझा जा सकता है कि कभी-कभी ब्रह्मा और इंद्र भी गिर जाते हैं, लेकिन भगवान के आध्यात्मिक निवास में रहने वाला भक्त कभी नहीं गिरता। जीवन की वह आध्यात्मिक अवस्था, जिसमें व्यक्ति भगवान के लीलाओं को सुनने में आनंद महसूस करता है, भगवान चैतन्य द्वारा भी बताई गई है। जब भगवान चैतन्य रामानांद राय से बात कर रहे थे, तो रामानांद ने आत्मिक प्राप्ति के बारे में कई प्रकार के सुझाव दिए थे, लेकिन भगवान चैतन्य ने उनमें से सिर्फ एक को स्वीकार किया- शुद्ध भक्तों के साथ बैठकर भगवान की जय-जयकार सुनो। यह सभी के लिए स्वीकार्य है, खास तौर पर इस युग में। व्यक्ति को भगवान की गतिविधियों के बारे में शुद्ध भक्तों से सुनने में समय बिताना चाहिए। यह मानव जाति के लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद माना गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥