श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.15.47 
तं त्वां विदाम भगवन् परमात्मतत्त्वं
सत्त्वेन सम्प्रति रतिं रचयन्तमेषाम् ।
यत्तेऽनुतापविदितैर्दृढभक्तियोगै-
रुद्ग्रन्थयो हृदि विदुर्मुनयो विरागा: ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
हम जानते हैं कि आप ही सर्वोच्च और सच्चे भगवान हैं, जो अपने दिव्य स्वरूप को शुद्ध अच्छाई के अप्रदूषित गुण के माध्यम से प्रकट करते हैं। आपका यह पवित्र और अमर स्वरूप आपकी कृपा और अटूट भक्ति के द्वारा ही उन महान ऋषियों द्वारा समझा जा सकता है जिनके हृदय भक्तिमय तरीकों से शुद्ध हो चुके हैं।
 
We know that You are the Supreme Truth, the Supreme Lord, who manifests Your divine form in the mode of pure Satva. This divine, eternal form of Yours is understood by Your grace through unwavering devotion by those sages whose hearts have been purified by the method of devotion.
तात्पर्य
पूर्ण सत्य को तीन विशेषताओं के रूप में समझा जा सकता है - निराकार ब्रह्म, स्थानीय रूप में परमात्मा और भगवान्, सर्वोच्च ईश्वर का व्यक्तित्व। यहाँ यह स्वीकार किया गया है कि पूर्ण सत्य को समझने में ईश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व अंतिम शब्द है। हालाँकि चार कुमारों को उनके महान विद्वान पिता, ब्रह्मा ने निर्देश दिया था, लेकिन वे वास्तव में पूर्ण सत्य को समझ नहीं पाए। वे केवल पूर्ण सत्य को तभी समझ पाए जब उन्होंने व्यक्तिगत रूप से ईश्वर के व्यक्तित्व को अपनी आँखों से देखा। दूसरे शब्दों में, यदि कोई ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व को देखता या समझता है, तो पूर्ण सत्य की अन्य दो विशेषताएँ, अर्थात् निराकार ब्रह्म और स्थानीय रूप में परमात्मा भी अपने आप समझ में आ जाती हैं। इसलिए कुमार पुष्टि करते हैं: "आप परम पूर्ण सत्य हैं।" निराकारवादी तर्क दे सकते हैं कि चूँकि सर्वोच्च ईश्वर का व्यक्तित्व इतनी अच्छी तरह से सजाया गया था, इसलिए वे पूर्ण सत्य नहीं थे। लेकिन यहाँ यह पुष्टि की जाती है कि पूर्ण मंच की सभी विविधता शुद्ध-सत्व, शुद्ध अच्छाई से बनी है। भौतिक दुनिया में, कोई भी गुण - अच्छाई, जुनून या अज्ञानता - दूषित है। यहाँ तक कि भौतिक जगत में अच्छाई की गुणवत्ता भी जुनून और अज्ञानता के रंगों से मुक्त नहीं है। लेकिन पारलौकिक दुनिया में, केवल शुद्ध अच्छाई, बिना जुनून या अज्ञानता के किसी भी रंग के मौजूद है; इसलिए भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का रूप और उनकी विविध लीलाएँ और अनुचर सभी शुद्ध सत्व-गुण हैं। भक्तों की संतुष्टि के लिए भगवान द्वारा शुद्ध अच्छाई में ऐसी विविधता को सदा के लिए प्रदर्शित किया जाता है। भक्त पूर्ण सत्य के सर्वोच्च व्यक्तित्व को शून्यता या निराकारवाद में नहीं देखना चाहता। एक अर्थ में, पूर्ण पारलौकिक विविधता केवल भक्तों के लिए है, दूसरों के लिए नहीं, क्योंकि पारलौकिक विविधता की यह विशिष्ट विशेषता केवल सर्वोच्च भगवान की दया से समझी जा सकती है, मानसिक अटकलों या आरोही प्रक्रिया से नहीं। ऐसा कहा जाता है कि कोई व्यक्ति ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व को तभी समझ सकता है जब वह उन पर थोड़ा भी मेहरबान हो; अन्यथा, उनकी कृपा के बिना, एक आदमी हजारों साल तक सोच-विचार कर सकता है और समझ नहीं पाता कि वास्तव में पूर्ण सत्य क्या है। भक्त द्वारा यह दया तब देखी जा सकती है जब वह पूरी तरह से संदूषण से मुक्त हो जाता है। इसलिए, यह कहा गया है कि जब सभी संदूषण जड़ से समाप्त हो जाते हैं और भक्त भौतिक आकर्षण से पूरी तरह से अलग हो जाता है, तभी वह भगवान की इस कृपा को प्राप्त कर सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)