श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.15.46 
कुमारा ऊचु:
योऽन्तर्हितो हृदि गतोऽपि दुरात्मनां त्वं
सोऽद्यैव नो नयनमूलमनन्त राद्ध: ।
यर्ह्येव कर्णविवरेण गुहां गतो न:
पित्रानुवर्णितरहा भवदुद्भवेन ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
कुमारों ने कहा : हे प्रभु, आप धूर्तों को दर्शन नहीं देते, हालाँकि आप सबके हृदय में विराजते हैं। परंतु जहाँ तक हमारी बात है, हम आपको अपने सामने देख रहे हैं, हालाँकि आप अनंत हैं। हमने आपके बारे में अपने पिता ब्रह्मा से जो कथन सुने हैं, वे अब आपके कृपालु दर्शन से वास्तविक हो गए हैं।
 
The Kumaras said: O dear Lord, You do not appear before the sly ones, although You reside within the heart of everyone. But as far as we are concerned, we see You before us, although You are infinite. The statements we have heard about You through our father, Brahma, with our own ears have now been actually realized by Your gracious appearance.
तात्पर्य
जिन्हें योगी कहा जाता है वो अपने दिमाग को केंद्रित करते हैं या अवैयक्तिक या शून्यता पर ध्यान लगाते हैं यहाँ वर्णित किया गया है। श्रीमद भागवतम का यह श्लोक उन लोगों का वर्णन करता है, जिनसे बहुत ही कुशल योगी बनने की अपेक्षा की जाती है जो ध्यान में लीन रहते हैं पर वे अपने हृदय के भीतर बैठे भगवान की परम हस्ती को नहीं खोज पाते हैं। इन लोगों को यहाँ "दुरात्मा" के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है वो व्यक्ति जिसका हृदय बहुत ही कपटी हो या जो कम बुद्धिमान हो, ठीक इसके विपरीत "महात्मा" होता है जिसका अर्थ है वो व्यक्ति जिसका हृदय विशाल हो। वे तथाकथित योगी जो, हालांकि ध्यान में लीन रहते हैं, वे व्यापक हृदय वाले नहीं हो पाते हैं और चार हाथों वाले नारायण रूप को नहीं ढूंढ पाते, हालाँकि वह उनके हृदय के भीतर ही विराजमान होता है। हालाँकि परम पूर्ण सत्य की पहली अनुभूति अवैयक्तिक ब्रह्म होती है, फिर भी व्यक्ति को भगवान के अवैयक्तिक तेज का अनुभव करके संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। ईशोपनिषद में भी, भक्त प्रार्थना करता है कि ब्रह्म का तेज उसके नेत्रों से दूर हो जाए ताकि वह भगवान के वास्तविक, व्यक्तिगत रूप को देख सके और इस प्रकार स्वयं को पूरी तरह संतुष्ट कर सके। इसी प्रकार, यद्यपि भगवान शुरुआत में अपने तेजस्वी शारीरिक तेज के कारण दृश्यमान नहीं होते, यदि कोई भक्त उन्हें ईमानदारी से देखना चाहता है, तो भगवान उसके समक्ष प्रकट होते हैं। भगवद गीता में कहा गया है कि भगवान को हमारी अपूर्ण आँखों से नहीं देखा जा सकता, उन्हें हमारे अपूर्ण कानों से नहीं सुना जा सकता और उन्हें हमारी अपूर्ण इंद्रियों से अनुभव नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर कोई श्रद्धा और भक्ति के साथ भक्ति सेवा में संलग्न होता है, तो भगवान स्वयं को प्रकट करते हैं। यहाँ चारों ऋषि, सनत-कुमार, सनातन, सनंदन और सनका को वास्तव में ईमानदार भक्त के रूप में वर्णित किया गया है। हालाँकि उन्होंने अपने पिता, ब्रह्मा से भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप के बारे में सुना था, लेकिन केवल अवैयक्तिक स्वरूप, ब्रह्म ही उन्हें प्रकट हुआ। लेकिन क्योंकि वे भगवान की ईमानदारी से तलाश कर रहे थे, इसलिए उन्होंने अंततः उनके व्यक्तिगत स्वरूप को सीधे देखा, जो उनके पिता द्वारा दिए गए वर्णन के अनुरूप था। इस प्रकार वे पूरी तरह संतुष्ट हो गए। यहाँ वे अपने आभार को व्यक्त करते हैं क्योंकि यद्यपि वे शुरुआत में मूर्ख निजीकरणवादी थे, लेकिन भगवान की कृपा से अब वे उनके व्यक्तिगत स्वरूप को देखने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते थे। इस श्लोक का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ऋषि अपने पिता ब्रह्मा से सुनने के अपने अनुभव का वर्णन करते हैं, जो स्वयं भगवान से पैदा हुए थे। दूसरे शब्दों में, यहाँ भगवान से ब्रह्मा, ब्रह्मा से नारद और नारद से व्यास, और इसी तरह शिष्य परंपरा को स्वीकार किया गया है। क्योंकि कुमार ब्रह्मा के पुत्र थे, इसलिए उन्हें ब्रह्मा के शिष्य उत्तराधिकार से वैदिक ज्ञान सीखने का अवसर मिला, और इसलिए, अपनी निजी जीवन शैली की शुरुआत के बावजूद, वे अंत में, भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप के प्रत्यक्ष दर्शी बने।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)