श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.15.42 
अत्रोपसृष्टमिति चोत्स्मितमिन्दिराया:
स्वानां धिया विरचितं बहुसौष्ठवाढ्यम् ।
मह्यं भवस्य भवतां च भजन्तमङ्गं
नेमुर्निरीक्ष्य नवितृप्तद‍ृशो मुदा कै: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
नारायण का अद्भुत सौन्दर्य उनके भक्तों के ज्ञान से कई गुना बढ़कर था। यह इतना आकर्षक था कि देवी लक्ष्मी की सुंदरता भी फीकी पड़ रही थी। हे देवगण, इस प्रकार प्रकट हुए भगवान, मेरे, भगवान शिव और तुम सभी के द्वारा पूजनीय हैं। ऋषियों ने उन्हें बड़ी उत्सुकता के साथ देखा और प्रसन्नता से उनके चरण-कमलों में अपना मस्तक झुकाया।
 
Narayana's matchless beauty, enhanced many times over by the wisdom of his devotees, was so attractive that it overpowered even the pride of the extremely beautiful goddess Lakshmi. O demigods, the Lord thus manifested is worthy of worship by me, by Lord Shiva and by all of you. The sages paid their respects to Him with unquenched eyes and bowed their heads at His lotus feet in delight.
तात्पर्य
प्रभु का सौंदर्य इतना आकर्षक था कि उसका यथोचित वर्णन नहीं किया जा सकता था। कहा जाता है कि देवी लक्ष्मी प्रभु की आध्यात्मिक और भौतिक रचनाओं में सबसे सुंदर दृश्य है; वह अपने आपको सबसे सुंदर मानती है, फिर भी जब प्रभु प्रकट हुए तो उसकी सुंदरता हार गई। दूसरे शब्दों में, प्रभु की उपस्थिति में लक्ष्मी की सुंदरता गौण है। वैष्णव कवियों के अनुसार, यह कहा जाता है कि प्रभु का सौंदर्य इतना आकर्षक है कि यह लाखों कामदेवों को परास्त कर देता है। इसलिए उन्हें मदन-मोहन कहा जाता है। यह भी वर्णित है कि प्रभु कभी-कभी राधारानी की सुंदरता के बाद पागल हो जाते हैं। कवि वर्णन करते हैं कि उन परिस्थितियों में, हालांकि भगवान कृष्ण मदन-मोहन हैं, वे राधारानी की सुंदरता से मदन-दाह या मोहित हो जाते हैं। वास्तव में प्रभु की सुंदरता अति उत्कृष्ट है, यहाँ तक कि वैकुण्ठ में लक्ष्मी की सुंदरता को भी पार कर जाती है। वैकुण्ठ लोकों में प्रभु के भक्त प्रभु को सबसे सुंदर के रूप में देखना चाहते हैं, लेकिन गोकुल या कृष्णलोक में भक्त राधारानी को कृष्ण से अधिक सुंदर रूप में देखना चाहते हैं। समायोजन यह है कि प्रभु, भक्त-वत्सल होने के कारण, या जो अपने भक्तों को प्रसन्न करना चाहते हैं, ऐसी विशेषताएँ धारण करते हैं ताकि भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव और अन्य देवता प्रसन्न हो सकें। यहाँ भी, भक्त-ऋषियों, कुमारों के लिए, प्रभु अपनी सबसे सुंदर विशेषता में प्रकट हुए, और वे उन्हें बिना तृप्त हुए देखते रहे और उन्हें और अधिक देखना जारी रखना चाहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)