भूयादघोनि भगवद्भिरकारि दण्डो
यो नौ हरेत सुरहेलनमप्यशेषम् ।
मा वोऽनुतापकलया भगवत्स्मृतिघ्नो
मोहो भवेदिह तु नौ व्रजतोरधोऽध: ॥ ३६ ॥
अनुवाद
मुनियों द्वारा शापित होने के पश्चात द्वारपालों ने कहा: यह सर्वथा उचित है कि आपने हमें आप जैसे मुनियों का अपमान करने के कारण दंडित किया है। परंतु हम प्रार्थना करते हैं कि हमारे पश्चाताप पर आपकी कृपा हो, और हम लगातार नीचे गिरते हुए भी परमेश्वर को भूलने का भ्रम न पालें।
After being cursed by the sages, the gatekeepers said: It is right that you have punished us for disrespecting sages like you. But we pray that due to your mercy on our repentance, we may not be tempted to forget the Lord while we are going down.
तात्पर्य
भगवान के एक भक्त के लिए किसी भी प्रकार का कठोर दंड सहनीय होता है पर वह दंड नहीं सहनीय है जिससे भगवान का विस्मरण हो जाए। द्वारपाल भी भक्त थे, वे अपने लिए निर्धारित दंड को समझ सकते थे, क्योंकि उन्हें इस बात का स्मरण था कि ऋषियों को वैकुण्ठलोक में प्रवेश ना करने देने के कारण उन्होंने बहुत बड़े अपराध किए थे। जीव के सबसे निम्न प्रकारों में, पशुओं के प्रकार में भगवान का विस्मरण सबसे अधिक होता है। द्वारपालों को पता था कि वे भौतिक सृष्टि के अपराधी विभाग में जा रहे हैं, उन्हें लग रहा था कि वे सबसे निम्न योनि में जा सकते हैं और भगवान को भूल सकते हैं। इसलिए उन्होंने प्रार्थना की कि जो जीवन वे शाप के कारण ग्रहण करने जा रहे हैं, उनमें ऐसा ना हो। भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय के १९वें और २०वें श्लोक में कहा गया है कि जो भगवान और उनके भक्तों से ईर्ष्या रखते हैं, उन्हें नीच योनियों में डाल दिया जाता है। जीवन के बाद जीवन ऐसे मूर्ख लोग भगवान को याद नहीं कर पाते और इस कारण वे लगातार गिरते ही चले जाते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥