श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.15.35 
तेषामितीरितमुभाववधार्य घोरं
तं ब्रह्मदण्डमनिवारणमस्त्रपूगै: ।
सद्यो हरेरनुचरावुरु बिभ्यतस्तत्-
पादग्रहावपततामतिकातरेण ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
जब वैकुण्ठलोक के द्वारपालों, जो निश्चित रूप से भगवान के भक्त थे, ने देखा कि उन्हें ब्राह्मणों द्वारा शापित किया जा रहा है, तो वे तुरंत बहुत डर गए और अत्यधिक चिंता के साथ ब्राह्मणों के चरणों में गिर पड़े, क्योंकि ब्राह्मण के शाप का निवारण किसी भी प्रकार के हथियार से नहीं किया जा सकता।
 
When the gatekeepers of Vaikuṇṭhaloka, who were actually devotees of the Lord, saw that they were about to be cursed by the brahmanas, they immediately became very frightened and, out of great anxiety, fell at the feet of the brahmanas, for the curse of a brahmana cannot be averted by any kind of weapon.
तात्पर्य
यद्यपि द्वारपालों ने ब्राह्मणों को वैकुंठ के द्वार में प्रवेश से रोक कर भूल की थी, लेकिन वे तुरंत उनके श्राप की गंभीरता को समझ गए थे। अपराध के कई प्रकार हैं, लेकिन सबसे बड़ा अपराध है भगवान के भक्त का अपमान करना। क्योंकि द्वारपाल भी भगवान के भक्त थे, वे अपनी गलती को समझने में सक्षम थे और जब चार कुमारों ने उन्हें श्राप देने के लिए तैयार हो गए, तो वे डर गए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)