श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.15.32 
मुनय ऊचु:
को वामिहैत्य भगवत्परिचर्ययोच्चै-
स्तद्धर्मिणां निवसतां विषम: स्वभाव: ।
तस्मिन् प्रशान्तपुरुषे गतविग्रहे वां
को वात्मवत्कुहकयो: परिशङ्कनीय: ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
ऋषियों ने कहा: ये कौन से दो व्यक्ति हैं जिन्होंने इतनी विरोधी मानसिकता विकसित कर रखी है? ये भगवान की सेवा के उच्चतम पद पर नियुक्त हैं और उनसे यही उम्मीद की जाती है कि उन्होंने भगवान जैसे ही गुण विकसित कर लिये होंगे? ये दोनों वैकुंठ में कैसे रह रहे हैं? इस भगवद्धाम में किसी शत्रु के आने की संभावना कहाँ है? भगवान का कोई शत्रु नहीं है। उनका कौन ईर्ष्यालु हो सकता है? शायद ये दोनों व्यक्ति दोगले हैं, इसलिए दूसरों पर भी अपने जैसा होने का संदेह करते हैं।
 
The sages said: Who are these two persons who have developed such a hostile attitude. They are appointed to the highest position of serving the Lord and are expected to have developed the same qualities as the Lord? How are these two persons living in Vaikuntha? Where is the possibility of any enemy in this abode of the Lord? The Supreme Personality of Godhead has no enemy. Who can be jealous of Him? Perhaps these two persons are hypocrites and therefore suspect others of being like themselves.
तात्पर्य
एक वैकुंठ लोक के निवासियों और भौतिक लोक के निवासियों में यह अंतर है कि वैकुंठ में सभी निवासी स्वयं भगवान की सेवा में संलग्न रहते हैं और उनके सभी गुणों से संपन्न होते हैं। महान व्यक्तियों द्वारा यह विश्लेषण किया गया है कि जब एक बद्ध आत्मा मुक्त हो जाती है और एक भक्त बन जाती है, तो उसमें भगवान के लगभग 79 प्रतिशत गुण विकसित हो जाते हैं। इसलिए वैकुंठ लोक में भगवान और निवासियों के बीच दुश्मनी का कोई प्रश्न नहीं है। यहाँ इस भौतिक लोक में नागरिक मुख्य कार्यकारियों या राज्य के प्रमुखों के विरोधी हो सकते हैं, लेकिन वैकुंठ में ऐसी कोई मानसिकता नहीं है। किसी को भी वैकुंठ में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है जब तक कि उसने पूरी तरह से अच्छे गुणों को विकसित नहीं किया है। अच्छाई का मूल सिद्धांत भगवान के व्यक्तित्व के प्रति अधीनता को स्वीकार करना है। इसलिए, ऋषि यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए कि महल में प्रवेश करने से उन्हें रोकने वाले दो द्वारपाल वैकुण्ठलोक के निवासियों की तरह बिल्कुल नहीं थे। यह कहा जा सकता है कि एक द्वारपाल का कर्तव्य यह निर्धारित करना है कि महल में किसे प्रवेश दिया जाए और किसे नहीं। लेकिन यह इस मामले में प्रासंगिक नहीं है क्योंकि किसी को भी वैकुंठ लोक में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है जब तक कि वह परम भगवान के प्रति भक्ति सेवा की अपनी मानसिकता को एक सौ प्रतिशत विकसित नहीं कर लेता। भगवान का कोई भी शत्रु वैकुण्ठलोक में प्रवेश नहीं कर सकता है। कुमारों ने निष्कर्ष निकाला कि द्वारपालों द्वारा उन्हें रोकने का एकमात्र कारण यह था कि द्वारपाल स्वयं धोखेबाज थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)