द्वार्येतयोर्निविविशुर्मिषतोरपृष्ट्वा
पूर्वा यथा पुरटवज्रकपाटिका या: ।
सर्वत्र तेऽविषमया मुनय: स्वदृष्टया
ये सञ्चरन्त्यविहता विगताभिशङ्का: ॥ २९ ॥
अनुवाद
सनक आदि मुनियों ने सर्वत्र सब द्वार खोल दिए। उन्हें अपना-परायापन का कुछ भी भेद नहीं था। खुले मन से उसी प्रकार सातवें द्वार में अपनी स्वेच्छा से चले गए, जिस प्रकार वे पहले के सोने, हीरे तथा अन्य रत्नों से जड़े हुए छह दरवाजों से आए थे।
Munis like Sanaka etc. opened the doors of all the places. They had no idea of self and other. They entered the seventh door willingly with an open mind in the same way as they had entered through the other six doors, which were made of gold and diamonds.
तात्पर्य
प्राचीन संतगण, जिनमें सनक, सनातन, सनंदन और सनतकुमार शामिल थे, अपने बहुत अधिक उम्र के होते हुए भी, हमेशा युवा बालक ही बने रहे। वे किसी भी प्रकार से दोहरे चरित्र वाले नहीं थे, और वे बच्चे ही जैसे दरवाज़े से स्थानों में बिना किसी भय के, कि वे इसे तोड़ रहे हैं, प्रवेश करते थे। बच्चों का स्वभाव यही होता है। एक बच्चा किसी भी स्थान पर प्रवेश कर सकता है, और कोई उसे रोकता नहीं है। वास्तव में, अपने प्रयासों में आम तौर पर बच्चों का स्वागत होता है, लेकिन अगर कभी किसी बच्चे को किसी दरवाज़े से प्रवेश करने से रोक दिया जाता है, तो वह निराश और गुस्सा तो होता ही है। यही बच्चों की प्रकृति होती है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। बालक जैसे पवित्र पुरुष महल के सभी छहों दरवाज़ों से प्रवेश कर गए, और किसी ने उन्हें नहीं रोका। इसीलिए जब उन्होंने सातवें दरवाज़े से प्रवेश करने का प्रयास किया और द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया, उन्हें लाठियों से रोका, तो वे स्वाभाविक रूप से बहुत क्रोधित और दुखी हो गए। एक आम बच्चा तो रो ही पड़ता, लेकिन ये आम बच्चे नहीं थे, उन्होंने तुरंत द्वारपालों को दंडित करने की तैयारी कर ली, क्योंकि द्वारपालों ने बहुत बड़ा अपराध किया था। आज भी भारत में किसी पवित्र व्यक्ति को किसी के दरवाज़े में प्रवेश करने से कभी रोका नहीं जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥