येऽभ्यर्थितामपि च तो नृगतिं प्रपन्ना
ज्ञानं च तत्त्वविषयं सहधर्मं यत्र ।
नाराधनं भगवतो वितरन्त्यमुष्य
सम्मोहिता विततया बत मायया ते ॥ २४ ॥
अनुवाद
ब्रह्माजी ने कहा: हे प्रिय देवताओ, मनुष्य का जीवन इतना महत्वपूर्ण है कि हमें भी मनुष्य के रूप में जन्म लेने की इच्छा होती है, क्योंकि मनुष्य के शरीर से परमेश्वर और उनके निवास को जाना जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति मनुष्य के रूप में जन्म लेकर भी परमेश्वर और उनके निवास को नहीं जान पाता तो यह समझना चाहिए कि उस पर प्रकृति का बहुत प्रभाव है।
Brahma said: O dear demigods, human life is so important that we too desire to have such a life, because in human form one can attain complete religious truth and knowledge. If in this human life a person is unable to understand God and His abode, then it must be understood that he is greatly affected by the influence of external nature.
तात्पर्य
ब्रह्माजी उस मनुष्य की दशा की बहुत कड़ी निंदा करते हैं जो भगवान और उनके भगवद् पद, वैकुण्ठ में रूचि नहीं लेता। मानवीय जीवन रूप की कामना स्वयं ब्रह्माजी भी करते हैं। ब्रह्मा और दूसरे देवताओं के पास मनुष्यों से कहीं अधिक अच्छे भौतिक शरीर होते हैं, फिर भी ब्रह्मा सहित देवता, मानवीय जीवन रूप को प्राप्त करने की कामना करते हैं क्योंकि यह विशेष रूप से उस जीव के लिए बना है जो भगवद् ज्ञान और धार्मिक पूर्णता को प्राप्त कर सकता है। एक जीवन में भगवान के पास वापस जाना संभव नहीं है, पर मानवीय जीवन रूप में व्यक्ति को कम से कम जीवन के लक्ष्य को समझ लेना चाहिए और कृष्ण चेतना की शुरुआत करनी चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि मनुष्य का शरीर एक वरदान है क्योंकि यह अज्ञानता के सागर को पार करने के लिए सबसे उपयुक्त नाव है। उस नाव में गुरु को सबसे सक्षम कप्तान माना जाता है, और धर्मग्रंथों की जानकारी अज्ञान के सागर को पार करने के लिए अनुकूल हवा है। जो मनुष्य इस जीवन में इन सभी सुविधाओं का लाभ नहीं उठाता, वह आत्महत्या कर रहा है। इसलिए जो व्यक्ति मानव जीवन रूप में कृष्ण चेतना की शुरुआत नहीं करता है, वह भ्रामक ऊर्जा के प्रभाव में अपना जीवन खो देता है। ब्रह्मा ऐसे मनुष्य की स्थिति पर खेद व्यक्त करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥