श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.15.22 
वापीषु विद्रुमतटास्वमलामृताप्सु
प्रेष्यान्विता निजवने तुलसीभिरीशम् ।
अभ्यर्चती स्वलकमुन्नसमीक्ष्य वक्त्र-
मुच्छेषितं भगवतेत्यमताङ्ग यच्छ्री: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मियाँ अपने बगीचों में तुलसीदल अर्पित करके मूंगे से जड़े दिव्य जलाशयों के किनारों पर भगवान की पूजा करती हैं। भगवान की पूजा करते हुए, वे पानी में उभरी हुई नाक वाले अपने सुंदर चेहरों के प्रतिबिंब को देख सकती हैं और ऐसा लगता है कि भगवान द्वारा उनके चेहरों पर चुंबन करने से वे और भी सुंदर हो गई हैं।
 
The Lakshmis worship the Lord in their gardens by offering tulasi leaves on the coral-studded banks of the divine reservoirs. While worshipping the Lord they can see the reflection of their beautiful faces with prominent noses in the water and it seems as if they have become even more beautiful by the Lord kissing their faces.
तात्पर्य
आम तौर पर जब एक पत्नी अपने पति के द्वारा चूमा जाता है, तो उसका चेहरा अधिक सुंदर हो जाता है। वैकुंठ में भी, हालांकि भाग्य की देवी स्वाभाविक रूप से कल्पना के रूप में सुंदर है, वह फिर भी अपने चेहरे को और अधिक सुंदर बनाने के लिए भगवान को चूमने का इंतजार करती है। भाग्य की देवी का सुंदर चेहरा पारलौकिक क्रिस्टल पानी के तालाब में दिखाई देता है जब वह अपने बगीचे में तुलसी के पत्तों से भगवान की पूजा करती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)