वैकुण्ठ ग्रहों में सभी निवासी भगवान पुरुषोत्तम के समान आकार-प्रकार वाले होते हैं। वे सभी इंद्रियसुख की इच्छाओं से परे होकर भगवान की भक्ति में लगे रहते हैं।
All the residents of the Vaikuntha planets have a form similar to that of the Supreme Personality of Godhead. They are all engaged in the devotion of the Lord, devoid of all desires for sense-gratification.
तात्पर्य
इस श्लोक में वैकुण्ठ में निवासियों और जीवन शैली का वर्णन किया गया है। यहाँ सभी निवासी सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान नारायण के समान हैं। वैकुण्ठ लोक में चार हाथों वाले नारायण के रूप में कृष्ण का विराट स्वरूप प्रमुख देवता है, और वैकुण्ठलोक के निवासी भी चार हाथों वाले होते हैं, जो हमारी भौतिक दुनिया में धारणा के बिल्कुल विपरीत है। भौतिक दुनिया में हमें कहीं भी चार हाथों वाला इंसान नहीं मिलेगा। वैकुण्ठलोक में प्रभु की सेवा के अलावा कोई काम नहीं है, और यह सेवा किसी उद्देश्य से नहीं की जाती है। हालाँकि प्रत्येक सेवा का एक खास परिणाम होता है, लेकिन भक्त कभी भी अपनी इच्छाओं की पूर्ति की आकांक्षा नहीं करते; उनकी इच्छाएँ प्रभु को दिव्य प्रेममय सेवा प्रदान करके पूरी होती हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥