श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  3.14.49 
अलम्पट: शीलधरो गुणाकरो
हृष्ट: परर्द्ध्या व्यथितो दु:खितेषु ।
अभूतशत्रुर्जगत: शोकहर्ता
नैदाघिकं तापमिवोडुराज: ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
वह समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण होगा, दूसरों के सुख में प्रसन्न और दूसरों के दुख में दुखी होने वाला होगा, और उसका कोई शत्रु नहीं होगा। वह सभी ब्रह्मांडों के दुखों को दूर करने वाला होगा, जैसे गर्मियों के सूरज के बाद सुखद चाँद।
 
He will be the most worthy repository of all virtues, he will be happy and happy in the happiness of others, sad in the sadness of others and he will not have a single enemy. He will be the destroyer of the sorrows of the whole universe like the beautiful moon after the summer sun.
तात्पर्य
भगवान् के अनुकरणीय भक्त प्रह्लाद महाराज में सभी अच्छे गुण मानवीय रूप में संभव थे। यद्यपि वह इस संसार के सम्राट थे, पर वह व्यर्थ खर्च नहीं करते थे। अपने बचपन से ही वह सभी अच्छे गुणों के भांडार थे। उन गुणों का वर्णन किए बिना, यहाँ संक्षेप में कहा गया है कि वह सभी अच्छे गुणों से युक्त थे। यही एक शुद्ध भक्त का लक्षण है। एक शुद्ध भक्त की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह होती है कि वह 'लम्पट' या कामुक नहीं होता है, और एक और गुण यह होता है कि वह हमेशा पीड़ित मानवता के दुखों को कम करने के लिए उत्सुक रहता है। एक जीव के लिए सबसे घातक दुख कृष्ण को भूल जाना है। इसलिए, एक शुद्ध भक्त हमेशा सभी के कृष्ण चेतना को जगाने की कोशिश करता है। यही सभी दुखों के लिए रामबाण है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)