श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.14.42 
दितिरुवाच
वधं भगवता साक्षात्सुनाभोदारबाहुना ।
आशासे पुत्रयोर्मह्यं मा क्रुद्धाद्ब्राह्मणाद्प्रभो ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
दिति ने कहा: मेरे लिए यह अत्यंत शुभ है कि मेरे पुत्र भगवान के सुदर्शन चक्र से उदारतापूर्वक वीरगति को प्राप्त होंगे। हे मेरे पति, वे कभी भी किसी ब्राह्मण-भक्त के क्रोध से न मारे जाएँ।
 
Diti said: It is most auspicious that my sons will be mercifully killed by the Lord with his Sudarshana Chakra. O my husband, may they never be killed by the anger of the devotees of Brahmana.
तात्पर्य
जब दिति ने अपने पति से सुना कि उसके पुत्रो के कार्यो से महात्मा क्रोधित होंगे तो वह बहुत चिंतित हुई। उसने सोचा कि उसके पुत्र शायद ब्राह्मणों के क्रोध से मारे जाएँगे। भगवान उस समय प्रकट नहीं होते जब ब्राह्मण किसी से क्रोधित होते है, क्योंकि एक ब्राह्मण का क्रोध स्वयं ही पर्याप्त होता है। लेकिन, वह निश्चित रूप से तब प्रकट होते है जब उनका भक्त केवल दुखी होता है। भगवान का भक्त कभी भी भगवान से प्रार्थना नहीं करता कि वह उसके लिए दुष्टों की मुसीबतों के निवारण के लिए प्रकट हो, और वह कभी भी उनको सुरक्षा के लिए परेशान नहीं करता। बल्कि, भगवान भक्तों को सुरक्षा देने के लिए उत्सुक रहते है। दिति अच्छी तरह से जानती थी कि उसके पुत्रों की भगवान द्वारा हत्या भी उनकी दया होगी, और इसलिए वह कहती है कि भगवान का पहिया और हाथ उदार है। अगर कोई भगवान के पहिये द्वारा मारा जाता है और इस प्रकार भगवान के हाथों को देखने के लिए पर्याप्त रूप से भाग्यशाली होता है, तो यह उसके उद्धार के लिए पर्याप्त है। ऐसा सौभाग्य महान ऋषियों द्वारा भी प्राप्त नहीं किया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)