श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.14.39 
भविष्यतस्तवाभद्रावभद्रे जाठराधमौ ।
लोकान् सपालांस्त्रींश्चण्डि मुहुराक्रन्दयिष्यत: ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
हे अहंकारी नारी! तेरी पापमयी कोख से दो नीच पुत्र जन्म लेंगे। हे अभागिन! वे तीनों लोकों के लिए लगातार शोक का कारण बनेंगे।
 
O arrogant woman! Two ungrateful sons will be born from your condemned womb. O unfortunate one! They will be the cause of constant grief for the three worlds.
तात्पर्य
अपमानित करने वाले पुत्र अपनी माँ की निंदा किए गए गर्भ से ही उत्पन्न होते हैं। भगवद्-गीता (1.40) में कहा गया है कि "जब धार्मिक जीवन के नियमित सिद्धांतों की जानबूझकर उपेक्षा की जाती है, तो महिलाएँ वर्ग के रूप में प्रदूषित हो जाती हैं और इसके परिणामस्वरूप अवांछित बच्चे पैदा होते हैं।" यह विशेष रूप से लड़कों पर लागू होता है; अगर माँ अच्छी नहीं है, तो अच्छे बेटे नहीं हो सकते। विद्वान कश्यप उन पुत्रों के चरित्र को समझ सकते थे जो दिति के निंदित गर्भ से उत्पन्न होते हैं। गर्भ की निंदा इस कारण से की गई क्योंकि माँ बहुत अधिक कामुक थी और इस प्रकार शास्त्रों के सभी नियमों और निषेधाज्ञाओं का उल्लंघन करती थी। जिस समाज में ऐसी महिलाएँ प्रमुख होती हैं, वहाँ अच्छे बच्चों की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)