कश्यप मुनि एक अवैयक्तिकवादी प्रतीत होते हैं। ऊपर बताए गए ठाकुर हरिदास के साथ उनके चरित्र की तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि एक व्यक्तिवादी, अवैयक्तिकवादी की तुलना में इंद्रिय-नियंत्रण में अधिक मजबूत होता है। इसे भगवद-गीता में परं दृष्ट्वा निवर्तते के रूप में समझाया गया है, अर्थात् जब व्यक्ति श्रेष्ठ स्थिति में होता है तो वह निम्न श्रेणी की चीजों को स्वीकार करना बंद कर देता है। स्नान करने और गायत्री का जाप करने के बाद व्यक्ति के शुद्ध होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन महा-मंत्र इतना शक्तिशाली है कि व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में, जोर-जोर से या धीरे-धीरे, जप कर सकता है और वह भौतिक अस्तित्व की सभी बुराइयों से सुरक्षित रहता है।
