श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.14.31 
स विदित्वाथ भार्यायास्तं निर्बन्धं विकर्मणि ।
नत्वा दिष्टाय रहसि तयाथोपविवेश हि ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
पत्नी के इरादे को समझकर, उन्हें वह वर्जित कार्य करना ही पड़ा और तब पूज्य प्रारब्ध को नमन करके वे उसके साथ एकांत में लेट गए।
 
Understanding his wife's intention, he had to do that forbidden act and then after paying obeisance to the revered destiny, he lay down with her in a secluded place.
तात्पर्य
कश्यप की अपनी पत्नी के साथ हुई बातचीत से प्रतीत होता है कि वे भगवान शिव के उपासक थे, और यद्यपि वे जानते थे कि इस प्रकार के वर्जित कृत्य से भगवान शिव उनसे प्रसन्न नहीं होंगे, किंतु वे अपनी पत्नी की इच्छा के वशीभूत होकर कार्य करने के लिए विवश हो गए, और इस प्रकार उन्होंने भाग्य को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। वे जानते थे कि ऐसे असमय किए गए मैथुन से उत्पन्न बालक निश्चित रूप से अच्छा बालक नहीं होगा, किंतु वे स्वयं को नहीं बचा पाए क्योंकि वे अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक बाध्य थे। हालाँकि, इसी प्रकार के एक अन्य मामले में, जब रात्रि के अंतिम पहर में ठाकुर हरिदास को एक सार्वजनिक वेश्या ने बहलाया, तो उन्होंने उसकी अभिलाषा से विमुख होकर कृष्ण चेतना में अपनी पूर्णता दिखाई। यही कृष्ण चेतन व्यक्ति और अन्य व्यक्तियों के बीच का अंतर है। कश्यप मुनि बहुत विद्वान और प्रबुद्ध थे, और वे व्यवस्थित जीवन के सभी नियमों और विनियमों को जानते थे, फिर भी वे कामवासना के हमले से खुद को नहीं बचा पाए। ठाकुर हरिदास का जन्म किसी ब्राह्मण परिवार में नहीं हुआ था और न ही वे स्वयं ब्राह्मण थे, फिर भी वे कृष्ण चेतन होने के कारण खुद को ऐसे हमले से बचा पाए। ठाकुर हरिदास प्रतिदिन तीन लाख बार भगवान का पवित्र नाम जपते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)