श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 14: संध्या समय दिति का गर्भ-धारण  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.14.27 
यस्यानवद्याचरितं मनीषिणो
गृणन्त्यविद्यापटलं बिभित्सव: ।
निरस्तसाम्यातिशयोऽपि यत्स्वयं
पिशाचचर्यामचरद्‍गति: सताम् ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि भौतिक जगत में न तो कोई भगवान शिव के समकक्ष है, न उनसे महान है और उनकी निंदनीय प्रकृति का अनुसरण महान आत्माओं द्वारा अज्ञानता के समूह को नष्ट करने के लिए किया जाता है, फिर भी वे सभी भक्तों को मुक्ति प्रदान करने के लिए ऐसे बने रहते हैं जैसे कोई राक्षस हो।
 
Although in the material world no one is equal to or greater than Lord Shiva, and His blameless character is followed by great souls to dispel the masses of ignorance, yet He persists like a demon to grant salvation to all the devotees of the Lord.
तात्पर्य
भगवान शिव के असभ्य, शैतानी चरित्र कभी भी घृणित नहीं हैं क्योंकि वह भगवान के सच्चे भक्तों को सिखाते हैं कि भौतिक भोग से वैराग्य का अभ्यास कैसे करें। उन्हें महादेव या सभी देवताओं में सबसे महान कहा जाता है, और भौतिक संसार में कोई भी उनके बराबर या उनसे अधिक नहीं है। वे लगभग भगवान विष्णु के समान हैं। हालाँकि वह हमेशा माया, दुर्गा से जुड़े रहते हैं, लेकिन वह भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों की प्रतिक्रियात्मक अवस्था से ऊपर हैं, और यद्यपि वह अज्ञानता के गुण में शैतानी पात्रों के प्रभारी हैं, लेकिन वह ऐसे जुड़ाव से प्रभावित नहीं होते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)