न वयं प्रभवस्तां त्वामनुकर्तुं गृहेश्वरि ।
अप्यायुषा वा कार्त्स्न्येन ये चान्ये गुणगृध्नव: ॥ २१ ॥
अनुवाद
हे गृहलक्ष्मी, हम न तो तुम्हारे जैसा काम कर सकते हैं, न ही तुम्हारे किए उपकारों का बदला चुका सकते हैं, चाहे हम जीवन भर या मृत्यु के बाद भी काम करते रहें। तुमसे उऋण होना उन लोगों के लिए भी असंभव है जो निजी गुणों के प्रशंसक होते हैं।
O Queen of the House, we are neither able to act like you nor can we repay you for what you have done, whether we continue to do so for the rest of our lives or even after our death. It is impossible even for those who admire personal qualities to repay you.
तात्पर्य
अपनी पत्नी द्वारा किए गए इस तरह के महिमामंडन से पता चलता है कि वह पत्नी का गुलाम है या व्यंग्यात्मक चुटकुले कर रहा है। कश्यप का अभिप्राय था कि पत्नी के साथ रहने वाले गृहस्थ कामुकता के सांसारिक सुख का आनंद उठाते हैं और साथ ही उन्हें नरक में जाने का भी डर नहीं होता। वैराग्य आश्रम में रहने वाले व्यक्ति की कोई पत्नी नहीं होती और वह कामुक इच्छाओं से प्रेरित होकर किसी दूसरी महिला या किसी और की पत्नी को चाह सकता है और इस प्रकार नरक जा सकता है। दूसरे शब्दों में, वैराग्य आश्रम का कथित पुरुष, जिसने अपना घर और पत्नी छोड़ दी है, अगर वह जानबूझकर या अनजाने में फिर से कामुक सुख चाहता है, तो वह नरक जाता है। इस तरह गृहस्थ सुरक्षित रहते हैं। इसलिए सभी पति वर्ग इस जीवन में या दूसरे जीवन में महिलाओं के लिए अपने कर्ज़ को नहीं चुका सकते। भले ही वे अपने पूरे जीवन महिलाओं को कर्ज़ चुकाने में लगे रहें, फिर भी यह संभव नहीं है। सभी पति अपनी पत्नियों के गुणों की सराहना करने में समर्थ नहीं होते हैं, लेकिन भले ही कोई इन गुणों की सराहना करने में समर्थ हो, फिर भी पत्नी के कर्ज को चुकाना संभव नहीं है। पति द्वारा अपनी पत्नी की इस तरह की असाधारण प्रशंसा निश्चित रूप से मजाक के रूप में होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥