ब्रह्माजी ने कहा, हे प्रिय पुत्र, हे जगत के स्वामी, मैं तुमसे अत्यधिक प्रसन्न हूं और तुम्हारे व तुम्हारी पत्नी दोनों के कल्याण की कामना करता हूं। तुमने मेरे आदेशों का पालन करने के लिए अपने हृदय से बिना किसी शर्त के मेरे शरण में आ गए हो।
Brahma said, O dear son, O Lord of the world, I am very pleased with you and wish for the welfare of both you and your wife. You have surrendered yourself to me without thinking in your heart for my orders.
तात्पर्य
पिता और पुत्र के संबंध में सदैव पवित्रता रहती है। पिता स्वाभाविक रूप से पुत्र के प्रति प्रेमभाव रखता है और पुत्र के जीवन में प्रगति के लिए सदा उसकी सहायता करने को तैयार रहता है। लेकिन पिता की प्रेमभावना के बावजूद पुत्र स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण कभी-कभी भटकाव का अनुभव कर लेता है। प्रत्येक जीव, चाहे वह कितना ही छोटा हो या बड़ा, उसके पास स्वतंत्रता का विकल्प होता है। यदि पुत्र पिता के मार्गदर्शन में चलने के लिए पूरी तरह से तैयार है, तो पिता उसके निर्देशन और मार्गदर्शन के लिए दश गुना अधिक उत्सुक होता है। ब्रह्मा और मनु के व्यवहार में प्रदर्शित पिता-पुत्र का संबंध उत्कृष्ट है। पिता और पुत्र दोनों ही योग्य हैं और उनके उदाहरण का सभी मानवों द्वारा पालन किया जाना चाहिए। मनु ने पुत्र के रूप में पिता ब्रह्मा से बिना किसी हिचकिचाहट के उपदेश देने का अनुरोध किया, और पिता, जो वैदिक ज्ञान से परिपूर्ण थे, उसे उपदेश देने के लिए बहुत प्रसन्न हुए। मानवों को मानवता के पिता के उदाहरण का कड़ाई से पालन करना चाहिए, इससे पिता और पुत्रों के संबंध की स्थिति सुधरेगी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥