श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  3.13.49 
तस्मिन् प्रसन्ने सकलाशिषां प्रभौ
किं दुर्लभं ताभिरलं लवात्मभि: ।
अनन्यद‍ृष्टय‍ा भजतां गुहाशय:
स्वयं विधत्ते स्वगतिं पर: पराम् ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् किसी पर प्रसन्न होते हैं तो उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहता। दिव्य उपलब्धि के द्वारा मनुष्य हर दूसरी वस्तु को नगण्य मानता है। जो व्यक्ति दिव्य प्रेमा भक्ति में अपने को लगाता है, उसे स्वयं प्रभु सर्वोच्च सिद्धावस्था तक ऊपर उठा देते हैं, जो प्रभु प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजमान हैं।
 
When the Supreme Personality of Godhead is pleased with one, nothing remains unattainable for one. Through divine attainment one considers everything else to be insignificant. One who engages himself in divine loving service is raised to the highest state of perfection by the Lord who is in everyone's heart.
तात्पर्य
भगवद्गीता (10.10) में कहा गया है, भगवान शुद्ध भक्तों को बुद्धि प्रदान करते हैं ताकि वे उच्चतम पूर्णता के स्तर तक पहुँच सकें। यहाँ पुष्टि की जाती है कि एक शुद्ध भक्त, जो लगातार भगवान की प्रेममय सेवा में लगा रहता है, उसे भगवान के परम व्यक्तित्व तक पहुँचने के लिए आवश्यक सभी ज्ञान दिए जाते हैं। ऐसे भक्त के लिए भगवान की सेवा के अलावा कुछ भी मूल्यवान नहीं है। यदि कोई निष्ठापूर्वक सेवा करता है, तो निराशा की कोई संभावना नहीं है क्योंकि भक्त की उन्नति की जिम्मेदारी स्वयं भगवान लेते हैं। भगवान व्यक्ति के हृदय में विराजमान होते हैं और भक्त की मंशा जान कर, प्राप्त करने योग्य सभी चीजों की व्यवस्था करते हैं। दूसरे शब्दों में, छद्म भक्त, जो भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए उत्सुक होता है, उच्चतम पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि भगवान उसकी मंशा जानते हैं। व्यक्ति को बस अपने उद्देश्य में सच्चा होना है और फिर भगवान हर तरह से मदद करने के लिए मौजूद रहेंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)