त्रयीमयं रूपमिदं च सौकरं
भूमण्डलेनाथ दता धृतेन ते ।
चकास्ति शृङ्गोढघनेन भूयसा
कुलाचलेन्द्रस्य यथैव विभ्रम: ॥ ४१ ॥
अनुवाद
हे प्रभु, जैसे विशाल पर्वतों की चोटियाँ बादलों से अलंकृत होने पर सुंदर दिखने लगती हैं, वैसे ही आपका दिव्य शरीर पृथ्वी को अपने दांतों के सिरे पर उठाने के कारण सुंदर दिख रहा है।
O Lord, just as the peaks of great mountains look beautiful when adorned with clouds, Your transcendental body also looks beautiful because You are holding the earth on the tips of Your jaws.
तात्पर्य
विभ्रमः शब्द अत्यधिक महत्वपूर्ण है। विभ्रमः का अर्थ "भ्रम" होने के साथ-साथ "सुंदरता" भी है। जब कोई बादल किसी विशाल पर्वत की चोटी पर विराजमान होता है, तो ऐसा लगता है कि वह पर्वत द्वारा सहारा लिया जा रहा है, और साथ ही बहुत सुंदर भी लगता है। इसी प्रकार, भगवान को पृथ्वी को अपने दांतों पर धारण करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन जब वे ऐसा करते हैं तो दुनिया सुंदर हो जाती है, जैसे पृथ्वी पर अपने शुद्ध भक्तों के कारण भगवान और भी सुंदर हो जाते हैं। यद्यपि भगवान वैदिक भजनों के पारलौकिक व्यक्तित्व हैं, पृथ्वी को धारण करने के लिए प्रकट होने के कारण वे और भी सुंदर हो गए हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥