तेषां सतत-युक्तनां
भजतां प्रीति-पूर्वकम्
ददामि बुद्धि-योगं तं
येन मामुपयन्ति ते
"जो निरंतर भगवान की भक्ति-भावना में लीन रहते हैं, निष्ठा और प्रेम से उनका भजन करता है, भगवान अवश्य ही उन्हें ऐसी बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे अंत में वे उन तक पहुँच सकें।"
अपने मन पर विजय पानी होती है और ऐसा वैदिक अनुष्ठानों का पालन और विभिन्न प्रकार के यज्ञ संपन्न करके किया जाता है। परम लक्ष्य भक्ति और भगवान की भक्ति-भावना को प्राप्त करना है। भक्ति के बिना व्यक्ति ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व को नहीं समझ सकता है। मूल ईश्वर का व्यक्तित्व या विष्णु के उनके असंख्य विस्तार वैदिक अनुष्ठानों और यज्ञों की आराधना कामात्र एकमात्र विषय हैं।
