Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 3.13.37: प्रभु, इसके साथ ही साथ सभी प्रकार की दीक्षा के लिए आपके बारम्बार प्रकट होने की आकांक्षा है। आपकी गर्दन तीनों इच्छाओं का स्थान है और आपकी दाढ़ें दीक्षा का फल और सभी इच्छाओं का अंत हैं। आपकी जीभ दीक्षा के पूर्व के कार्य हैं, आपका सिर यज्ञ रहित अग्नि और पूजा की अग्नि है और आपकी जीवनी शक्ति सभी इच्छाओं का समुच्चय है। | bhagavat अध्याय 3.13: वराह भगवान् का प्राकट्य । bhagavat स्कन्ध 3: यथास्थिति । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
दीक्षानुजन्मोपसद: शिरोधरं
त्वं प्रायणीयोदयनीयदंष्ट्र: ।
जिह्वा प्रवर्ग्यस्तव शीर्षकं क्रतो:
सत्यावसथ्यं चितयोऽसवो हि ते ॥ ३७ ॥
अनुवाद
प्रभु, इसके साथ ही साथ सभी प्रकार की दीक्षा के लिए आपके बारम्बार प्रकट होने की आकांक्षा है। आपकी गर्दन तीनों इच्छाओं का स्थान है और आपकी दाढ़ें दीक्षा का फल और सभी इच्छाओं का अंत हैं। आपकी जीभ दीक्षा के पूर्व के कार्य हैं, आपका सिर यज्ञ रहित अग्नि और पूजा की अग्नि है और आपकी जीवनी शक्ति सभी इच्छाओं का समुच्चय है।
O Lord, along with this, there is also the desire for Your repeated appearance for all kinds of initiations. Your neck is the seat of the three desires, and Your molars are the fruit of initiation and the end of all desires, Your tongue is the precursor to initiation, Your head is the fire without sacrifice and the fire of worship, and Your life-force is the sum total of all desires.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥