स्रक्तुण्ड आसीत्स्रुव ईश नासयो-
रिडोदरे चमसा: कर्णरन्ध्रे ।
प्राशित्रमास्ये ग्रसने ग्रहास्तु ते
यच्चर्वणं ते भगवन्नग्निहोत्रम् ॥ ३६ ॥
अनुवाद
हे परमेश्वर, आपकी जीभ यज्ञ का स्रक् है, आपका नथुना यज्ञ का स्रुवा है, आपके उदर में यज्ञ का इडा पात्र है और आपके कानों के छिद्रों में यज्ञ का चमस पात्र है। आपका मुख ब्रह्मा का प्राशित्र यज्ञ पात्र है, आपका गला सोमपात्र यज्ञ पात्र है और आप जो भी चबाते हैं वह अग्निहोत्र कहलाता है।
O Lord, Your tongue is the sacrificial vessel (srak), Your nostril is another sacrificial vessel (sruva). In Your stomach is the sacrificial food vessel (ida) and in Your ear-holes is another sacrificial vessel (chamas). Your mouth is the sacrificial vessel (prashitra) of Brahma, Your throat is the sacrificial vessel called Somapatra and whatever You chew is called Agnihotra.
तात्पर्य
वेद-वादी कहते हैं कि वेदों और वेदों में वर्णित यज्ञों के अनुष्ठान के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। आजकल उन्होंने अपने समूह में एक नियम बनाया है कि रोजाना यज्ञ का अनुष्ठान औपचारिक रूप से किया जाए। वे बस एक छोटी से आग प्रज्वलित करते हैं और मनमानी ढंग से कुछ आहुतियाँ देते हैं, पर वे वेदों में वर्णित यज्ञ नियमों और विधियों का कड़ाई से पालन नहीं करते हैं। यह बात समझ में आती है कि नियमानुसार, यज्ञ के लिए अलग-अलग पात्रों की आवश्यकता होती है, जैसे कि शृक, श्रुवा, बर्हिस्, चातुर्होत्र, इडा, चमस, प्राशित्र, ग्रह और अग्निहोत्र। व्यक्ति यज्ञविधि के सख्त नियमों का पालन किए बिना यज्ञ के परिणामों को प्राप्त नहीं कर सकता। इस युग में, सख्त अनुशासन के साथ यज्ञ अनुष्ठान करने की व्यवस्था नहीं के बराबर है। इसलिए, कलि के इस युग में, इस तरह के यज्ञों के लिए एक प्रतिबंध है: स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है कि केवल संकीर्तन-यज्ञ किया जाए और कुछ नहीं। परमेश्वर के अवतार यज्ञेश्वर हैं, और जब तक व्यक्ति भगवान के अवतार का आदर नहीं करता, तब तक वह यज्ञ को पूर्ण रूप से नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में, भगवान की शरण लेना और उनकी सेवा करना ही सभी यज्ञों का वास्तविक अनुष्ठान है, जैसा कि यहाँ बताया गया है। यज्ञ के विभिन्न पात्र भगवान के अवतार के शरीर के विभिन्न अंगों के अनुरूप होते हैं। श्रीमद्भागवतम् के ग्यारहवें स्कंध में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि व्यक्ति संकीर्तन-यज्ञ करे जिससे भगवान के अवतार के रूप में श्री चैतन्य महाप्रभु प्रसन्न हों। यज्ञ अनुष्ठान का परिणाम पाने के लिए इसका कड़ाई से पालन करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥