हे प्रभु, आपका स्वरूप यज्ञ करके पूजनीय है, किन्तु दुष्टात्माएँ इसे देख पाने में असमर्थ हैं। गायत्री सहित सभी वैदिक मंत्र आपकी त्वचा के सम्पर्क में हैं। आपके शरीर के रोम कुश हैं, आपकी आँखें घृत हैं और आपके चार पाँव चार प्रकार के सकाम कर्म हैं।
O Lord, Your form is worthy of worship by performing sacrifices, but evil spirits are unable to see it. Gayatri and all other Vedic mantras are in contact with Your skin. The hairs of Your body are kusha, Your eyes are ghee and Your four feet are four types of fruitive actions.
तात्पर्य
भगवद्-गीता में जिन दुष्टों के लिए वेद-वादी अर्थात् वेद के कट्टर अनुयायी शब्द प्रयुक्त हुए हैं वह यहाँ एक वर्ग है। वे प्रभु के अवतार में विश्वास नहीं करते, प्रभु के पूजनीय सूकर के रूप में अवतरित होने की बात तो दूर है। वे प्रभु के भिन्न-भिन्न रूपों या अवतारों की पूजा को मानवरूपतावाद कहते हैं। श्रीमद्-भागवतम् में इनको दुष्टों में गिना गया है और भगवद्-गीता (7.15) में इन्हें दुष्ट ही नहीं, मूर्ख और मनुष्यों में नीच भी कहा गया है और कहा गया है कि इनके ज्ञान को उनकी नास्तिक प्रवृति के कारण माया ने हर लिया है। ऐसे अधम लोगों के लिए प्रभु का विशालकाय सूकर के रूप में अवतार अदृश्य है। प्रभु के शाश्वत रूपों की अवहेलना करनेवाले वेद के ये कट्टर अनुयायी श्रीमद्-भागवतम् से यह जान सकते हैं कि ऐसे अवतार वेदों के साकार रूप होते हैं। यहाँ प्रभु वराह की त्वचा, उनकी आँखें और उनके शरीर के रोएँ छिद्र, सब वेद के विभिन्न अंश कहे गए हैं। अतः वे वैदिक मंत्रों के साकार रूप हैं, विशेषतः गायत्री मंत्र के।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥