जब भगवान को उनके भक्तों द्वारा प्रार्थनाएँ अर्पित की जाती हैं, तो उनकी अलौकिक गतिविधियों का वर्णन किया जाता है। यहाँ भगवान वराह की कुछ अलौकिक विशेषताएँ दी गई हैं। जैसा कि ऊपरी तीनों ग्रह प्रणालियों के निवासियों ने भगवान को अपनी प्रार्थनाएँ अर्पित कीं, यह समझा जाता है कि उनका शरीर ब्रह्माण्ड के सबसे ऊपरी ग्रह, ब्रह्मलोक, या सत्यलोक से शुरू होकर पूरे आकाश में फैला हुआ था। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि उनकी आँखें सूर्य और चंद्रमा हैं, इसलिए उन्होंने जिस तरह से आकाश को देखा, वह सूर्य या चंद्रमा की तरह ही प्रकाशवान था। भगवान को यहाँ महिध्रः के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है "बड़ा पर्वत" या "पृथ्वी का पालनहार"। दूसरे शब्दों में, भगवान का शरीर हिमालय पर्वत की तरह बड़ा और कठोर था, अन्यथा यह कैसे संभव था कि उन्होंने पूरी पृथ्वी को अपने श्वेत दांतों पर आधारित रखा हो? भगवान के एक महान भक्त, कवि जयदेव ने अपने अवतारों के लिए प्रार्थनाओं में घटना का गान किया है:
वसति दशन-शिखरे धरणी तव लग्ना
शशिनी कलंक-कलेव निमग्ना
केशव धृत-शूकर-रूप जय जगदीश हर
"भगवान केशव [कृष्ण] को नमन हो, जिन्होंने वराह अवतार लिया था। पृथ्वी उनके दांतों के बीच में थी, जो चंद्रमा पर निशान की तरह दिखाई देती थी।"
