श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.13.26 
तेषां सतां वेदवितानमूर्ति-
र्ब्रह्मावधार्यात्मगुणानुवादम् ।
विनद्य भूयो विबुधोदयाय
गजेन्द्रलीलो जलमाविवेश ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
वैदिक ऋचाओं के द्वारा महान भक्तों द्वारा की गयी स्तुतियों के उत्तर में गर्जना कर वे हाथी की तरह खेलते हुए जल में प्रवेश कर गए। भगवान वैदिक ऋचाओं के लक्ष्य हैं, इसलिए वे समझ गए कि भक्त उनकी ही स्तुति कर रहे हैं।
 
Sporting like an elephant, He entered the water roaring again in response to the Vedic prayers offered by the great devotees. The Lord is the object of Vedic prayers, and He understood that the devotees' prayers were being offered for Him.
तात्पर्य
किसी भी आकार में भगवान का रूप सदैव अलौकिक और ज्ञान तथा करुणा से परिपूर्ण होता है। भगवान सभी भौतिक संदूषणों का नाश करने वाले हैं क्योंकि उनका रूप वैदिक ज्ञान की साकार मूर्ति है। सभी वेद प्रभु के दिव्य रूप की पूजा करते हैं। वैदिक मंत्रों में भक्त प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि वह चमकदार प्रभामंडल को हटा दें क्योंकि यह उनके वास्तविक चेहरे को ढक लेता है। यह ईशोपनिषद का वर्णन है। भगवान का कोई भौतिक रूप नहीं है, परन्तु उनके रूप को सदैव वेदों के सन्दर्भ में समझा जाता है। कहा जाता है कि वेद प्रभु की सांस हैं, और उस सांस को ब्रह्मा ने अंदर लिया था, जो वेदों के मूल छात्र थे। ब्रह्मा के नथुनों से निकलने वाली सांस से प्रभु वराह का प्रादुर्भाव हुआ, और इसलिए भगवान का वराह अवतार वेदों की साक्षात मूर्ति है। उच्चतर ग्रहों पर ऋषियों द्वारा अवतार की महिमा का गान वास्तविक वैदिक स्तोत्रों से मिलकर बना था। जब भी भगवान की महिमा का गान किया जाता है, तो यह समझना चाहिए कि वैदिक मंत्रों का सही ढंग से उच्चारण किया जा रहा है। इसलिए भगवान जब ऐसे वैदिक मंत्रों का जाप किया गया तो प्रसन्न हुए, और अपने शुद्ध भक्तों को प्रोत्साहित करने के लिए, उन्होंने एक बार फिर से गर्जना की और जलमग्न पृथ्वी को बचाने के लिए पानी में प्रवेश किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)