श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.13.11 
स त्वमस्यामपत्यानि सद‍ृशान्यात्मनो गुणै: ।
उत्पाद्य शास धर्मेण गां यज्ञै: पुरुषं यज ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
चूँकि तुम मेरे अति आज्ञाकारी पुत्र हो, इसलिए मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि तुम अपनी पत्नी के गर्भ से स्वयं के समान योग्य संतानें उत्पन्न करो। तुम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की भक्ति के सिद्धांतों का पालन करते हुए सारे जगत पर राज करो और इस तरह यज्ञों को पूर्ण करके भगवान की आराधना करो।
 
Since you are my most obedient son, I order you to produce children as worthy as yourself from the womb of your wife. You should rule the entire world by following the principles of devotion to the Supreme Personality of Godhead and thus worship the Lord by performing sacrifices.
तात्पर्य
ब्रह्मा जी द्वारा पदार्थ सृजन का उद्देश्य यहाँ स्पष्ट रूप से वर्णित है। प्रत्येक मनुष्य को, ईश्वर की भक्ति के लिए एक बलिदान के रूप में, अपनी पत्नी के गर्भ में अच्छे बच्चों को जन्म देना चाहिए। विष्णु पुराण (3.8.9) में कहा गया है:

varṇāśramācāravatā

puruṣeṇa paraḥ pumān

viṣṇur ārādhyate panthā

nānyat tat-toṣa-kāraṇam

"व्यक्ति वर्ण और आश्रम के नियमों का पालन करके भगवान विष्णु की पूजा कर सकता है। वर्णाश्रम प्रणाली के नियमों का पालन करने के अलावा भगवान को प्रसन्न करने का कोई और तरीका नहीं है।"

विष्णु की पूजा मानव जीवन का परम लक्ष्य है। जो लोग कामुकता की लालसा के लिए विवाहित जीवन की आज्ञा लेते हैं, उन्हें भगवान विष्णु को संतुष्ट करने की जिम्मेदारी भी लेनी होगी, और पहला कदम वर्णाश्रम-धर्म प्रणाली है। वर्णाश्रम-धर्म विष्णु की पूजा में उन्नति करने के लिए एक व्यवस्थित संस्था है। हालाँकि, यदि कोई सीधे भगवान की भक्ति में संलग्न हो जाता है, तो वर्णाश्रम-धर्म की अनुशासनात्मक प्रणाली से गुजरना आवश्यक नहीं हो सकता है। ब्रह्मा के अन्य पुत्र, कुमार, सीधे भक्ति में लगे हुए थे, और इस प्रकार उन्हें वर्णाश्रम-धर्म के सिद्धांतों का पालन करने की आवश्यकता नहीं थी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)