श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 13: वराह भगवान् का प्राकट्य  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.13.10 
एतावत्यात्मजैर्वीर कार्या ह्यपचितिर्गुरौ ।
शक्त्याप्रमत्तैर्गृह्येत सादरं गतमत्सरै: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
हे वीर, तुम्हारा उदाहरण पिता-पुत्र के रिश्ते में बहुत उपयुक्त है। बड़ों की ऐसी पूजा करना अपेक्षित है। जो ईर्ष्या की सीमा से परे और विवेकशील हो, वह अपने पिता के आदेशों को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार करता है और उन्हें अपनी पूरी क्षमता से पूरा करता है।
 
O brave one, your example is entirely appropriate for a father-son relationship. Such worship of elders is expected. One who is beyond the bounds of jealousy and is prudent, gladly accepts his father's command and carries it out to the best of his ability.
तात्पर्य
हिंदी-टीका: जब ब्रह्मा के चार पूर्व पुत्र, सनका, सनातन, सनंदन और सनत-कुमार, अपने पिता का पालन करने से इनकार कर दिया, तो ब्रह्मा को कष्ट हुआ, और उनका क्रोध रुद्र के रूप में प्रकट हुआ। वह घटना ब्रह्मा को नहीं भूली थी, और इसलिए मनु स्वायंभुव की आज्ञाकारिता बहुत उत्साहजनक थी। भौतिक दृष्टिकोण से, चार ऋषियों द्वारा अपने पिता के आदेश की अवज्ञा निश्चित रूप से घृणित थी, लेकिन क्योंकि ऐसी अवज्ञा एक उच्च उद्देश्य के लिए थी, वे अवज्ञा की प्रतिक्रिया से मुक्त थे। हालाँकि, जो लोग भौतिक आधार पर अपने पिता की अवज्ञा करते हैं, ऐसे अवज्ञा के लिए निश्चित रूप से अनुशासनात्मक प्रतिक्रिया के अधीन हैं। भौतिक आधार पर मनु द्वारा अपने पिता की आज्ञाकारिता निश्चित रूप से ईर्ष्या से मुक्त थी, और भौतिक दुनिया में सामान्य पुरुषों के लिए मनु के उदाहरण का पालन करना अनिवार्य है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)