श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.12.5 
तान् बभाषे स्वभू: पुत्रान् प्रजा: सृजत पुत्रका: ।
तन्नैच्छन्मोक्षधर्माणो वासुदेवपरायणा: ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
पुत्रों को उत्पन्न करने के बाद ब्रह्मा ने उनसे कहा, "बेटों, अब तुम लोग सन्तानें पैदा करो।" परन्तु सर्वश्रेष्ठ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव के प्रति अभिमुख होने के कारण उन्होंने अपना लक्ष्य मोक्ष बना रखा था, इस कारण उन्होंने अपनी अनिच्छा प्रकट की।
 
After producing the sons, Brahmā said to them, “Sons, now produce progeny.” But being attached to the Supreme Personality of Godhead Vasudeva, they had set salvation as their goal, and therefore they expressed their unwillingness.
तात्पर्य
ब्रह्मा के चार पुत्र कुमार, अपने महान पिता ब्रह्मा के अनुरोध पर भी गृहस्थ बनने से इंकार कर दिया। जो लोग भौतिक बंधन से मुक्ति पाने के बारे में गंभीर हैं, उन्हें पारिवारिक बंधन के झूठे रिश्ते में नहीं उलझना चाहिए। लोग पूछ सकते हैं कि कैसे कुमार ब्रह्मा के आदेशों को अस्वीकार कर सकते थे, जो उनके पिता और सबसे ऊपर, ब्रह्मांड के निर्माता थे। उत्तर यह है कि जो वाुसुदेव-परायण है, या भगवान वाुसुदेव की भक्ति सेवा में गंभीरता से लगा हुआ है, उसे किसी अन्य दायित्व की परवाह नहीं करनी चाहिए। भागवतम (11.5.41) में यह निषेध किया गया है:

देवर्षि-भूताप्त-नृणां पितॄणां

ना किंकरो नायम ऋणी च राजन

सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं

गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्

"जिसने भी पूरी तरह से सभी सांसारिक संबंधों को त्याग दिया है और भगवान के चरण कमलों का पूर्ण आश्रय लिया है, जो हमें मोक्ष देते हैं और जो अकेले ही आश्रय लेने के योग्य हैं, वह अब किसी का भी ऋणी या सेवक नहीं रहा, जिसमें देवता, पितृ, ऋषि, अन्य जीव, रिश्तेदार और मानव समाज के सदस्य शामिल हैं।" इस प्रकार कुमारों के कृत्यों में कुछ भी गलत नहीं था जब उन्होंने अपने महान पिता के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया कि वे गृहस्थ बनें।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)