देवर्षि-भूताप्त-नृणां पितॄणां
ना किंकरो नायम ऋणी च राजन
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं
गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्
"जिसने भी पूरी तरह से सभी सांसारिक संबंधों को त्याग दिया है और भगवान के चरण कमलों का पूर्ण आश्रय लिया है, जो हमें मोक्ष देते हैं और जो अकेले ही आश्रय लेने के योग्य हैं, वह अब किसी का भी ऋणी या सेवक नहीं रहा, जिसमें देवता, पितृ, ऋषि, अन्य जीव, रिश्तेदार और मानव समाज के सदस्य शामिल हैं।" इस प्रकार कुमारों के कृत्यों में कुछ भी गलत नहीं था जब उन्होंने अपने महान पिता के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया कि वे गृहस्थ बनें।
