ब्रह्मा की आत्मा को स्पर्श वर्णों के रूप में जाना जाता है, उनका शरीर स्वरों के रूप में, उनकी इंद्रियों को ऊष्म वर्णों के रूप में, उनकी शक्ति को मध्य वर्णों के रूप में और उनकी कामुक गतिविधियों को संगीत के सात स्वरों के रूप में जाना जाता है।
Brahma's soul appeared as touch syllables, his body as vowels, his senses as hot syllables, his strength as internal syllables and his sensory activities as the seven notes of music.
तात्पर्य
संस्कृत भाषा में तेरह स्वर और पैंतीस व्यंजन हैं। स्वर ये हैं - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, ळ, ए, ऐ, ओ, औ और व्यंजन - क, ख, ग, घ, आदि। व्यंजनों में पहले पच्चीस को स्पर्श कहा जाता है। इसके अलावा चार अंतःस्थ हैं। ऊष्म तीन हैं जिन्हें तालव्य, मूर्धन्य और दंत्य कहा जाता है। संगीतमय ध्वनियाँ हैं ष, ऋ, गा, म, ध, नी। इन सभी ध्वनि कंपनों को मूल रूप से शब्द-ब्रह्म या आध्यात्मिक ध्वनि कहा जाता है। इसलिए कहा जाता है कि महाकल्प में ब्रह्मा आध्यात्मिक ध्वनि के अवतार के रूप में रचे गए थे। वेद आध्यात्मिक ध्वनि हैं और इसलिए वैदिक साहित्य की ध्वनि कम्पन के लिए भौतिक व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं है। वेदों का कंपन वैसा ही होना चाहिए जैसा वे हैं, हालाँकि वे प्रतीकात्मक रूप से ऐसे अक्षरों द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं जिन्हें हम भौतिक रूप से जानते हैं। अंतिम रूप में कुछ भी भौतिक नहीं है क्योंकि सभी की उत्पत्ति आध्यात्मिक दुनिया में है। इसलिए भौतिक अभिव्यक्ति को शब्द के उचित अर्थ में भ्रम कहा जाता है। जो आत्मा के साक्षात्कार कर लेते हैं उनके लिए आत्मा के अलावा कुछ नहीं होता।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥