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bhagavat 3.12.46: पद्य लेखन की कला, जो पंक्ति के रूप में प्रसिद्ध है, अस्थि मज्जा से प्रकट हुई और दूसरी कला का नाम बृहती है और श्लोक की यह कला सजीवों के स्वामी के प्राणों से उत्पन्न हुई।   |   bhagavat अध्याय 3.12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि   ।   bhagavat स्कन्ध 3: यथास्थिति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.12.46 
मज्जाया: पङ्‌क्तिरुत्पन्ना बृहती प्राणतोऽभवत् ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
पद्य लेखन की कला, जो पंक्ति के रूप में प्रसिद्ध है, अस्थि मज्जा से प्रकट हुई और दूसरी कला का नाम बृहती है और श्लोक की यह कला सजीवों के स्वामी के प्राणों से उत्पन्न हुई।
 
The art of writing line verses originated from the marrow of the bones and another art of writing verses originated from the life force of the Lord of living beings.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)