Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
bhagavat 3.12.45: तत्पश्चात् परमेश्वर प्रजापति के देह के रोमों से उष्णिक अर्थात् साहित्य में अभिव्यक्ति की कला पैदा हुई। मुख्य वैदिक मंत्र गायत्री जीवों के अधिपति की त्वचा से उत्पन्न हुआ, त्रिष्टुप् उनके मांस से, अनुष्टुप शिराओं से तथा जगती छंद उनकी हड्डियों से उत्पन्न हुआ।   |   bhagavat अध्याय 3.12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि   ।   bhagavat स्कन्ध 3: यथास्थिति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.12.45 
तस्योष्णिगासील्लोमभ्यो गायत्री च त्वचो विभो: ।
त्रिष्टुम्मांसात्स्‍नुतोऽनुष्टुब्जगत्यस्थ्न: प्रजापते: ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् परमेश्वर प्रजापति के देह के रोमों से उष्णिक अर्थात् साहित्य में अभिव्यक्ति की कला पैदा हुई। मुख्य वैदिक मंत्र गायत्री जीवों के अधिपति की त्वचा से उत्पन्न हुआ, त्रिष्टुप् उनके मांस से, अनुष्टुप शिराओं से तथा जगती छंद उनकी हड्डियों से उत्पन्न हुआ।
 
Thereafter, Ushnik i.e. the art of literary expression arose from the hairs of the body of Almighty Prajapati. The main Vedic mantra Gayatri was born from the skin of the Lord of the living beings, Trishtup was born from his flesh, Anushtup was born from his veins and Jagati Chhand was born from his bones.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)