श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.12.35 
चातुर्होत्रं कर्मतन्त्रमुपवेदनयै: सह ।
धर्मस्य पादाश्चत्वारस्तथैवाश्रमवृत्तय: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
अग्नि यज्ञ को सम्पन्न करने की चार प्रकार की सामग्री प्रकट हुई: यज्ञ करने वाला [मंत्र उच्चारण करने वाला], दान देने वाला, अग्नि और उपवेदों के रूप में की गयी पूरक क्रियाएँ। धार्मिकता के चार सिद्धांत [सत्य, तप, दया और पवित्रता] और चारों सामाजिक व्यवस्थाओं में कर्तव्य भी प्रकट हुए।
 
Four types of paraphernalia comprising the Agni Yajna appeared. These types are the Yajna performer, Hota, Agni and the deeds performed in the form of Upvedas. The four principles of Dharma (truth, penance, mercy, cleanliness) and the duties of the four ashrams also appeared.
तात्पर्य
आहार, निद्रा, रक्षा और मैथुन ये चार सांसारिक शारीरिक आवश्यकताओं के सिद्धांत हैं, जो जानवरों और मानव समाज दोनों के लिए समान हैं। मानव समाज को जानवरों से अलग दिखाने के लिए सामाजिक स्थितियों और जीवन के क्रमों के संदर्भ में धार्मिक गतिविधियों का पालन करना होता है। ये सभी वैदिक साहित्यों में स्पष्ट रूप से वर्णित हैं और भगवान ब्रह्मा द्वारा प्रकट किए गए थे जब चारों वेद उनके चार मुखों से उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार, स्थितियों और सामाजिक व्यवस्थाओं के संदर्भ में मानव जाति के कर्तव्यों को सभ्य मनुष्य द्वारा पालन करने के लिए स्थापित किया गया था। जो लोग परंपरागत रूप से इन सिद्धांतों का पालन करते हैं उन्हें आर्य या प्रगतिशील इंसान कहा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)