स्व-पाद-मूलं भजताः प्रियस्य
त्यक्त्वान्य-भावस्य हरिः परेशः
विकर्म यद चोत्पतितं कथं-चित्
धुनोति सर्वं हृदि संनिविष्टः
“कोई भी व्यक्ति जो भगवान की पूर्ण भक्ति में लीन होकर, उनके चरणों की सेवा करता है, वह भगवान हरि को बहुत प्रिय है और भक्त के हृदय में विराजने वाले भगवान गलती से किए गए सभी प्रकार के पापों को क्षमा कर देते हैं।” यह कभी भी अपेक्षित नहीं था कि ब्रह्मा जैसा कोई महान व्यक्ति कभी अपनी पुत्री के साथ संबंध बनाने के बारे में सोचेगा। ब्रह्मा द्वारा दिखलाया गया उदाहरण केवल इतना ही बताता है कि प्रकृति की शक्ति कितनी प्रबल है और यह किसी पर भी कार्य कर सकती है, यहाँ तक कि ब्रह्मा पर भी। भगवान की कृपा से ब्रह्मा बच तो गए लेकिन उन्हें थोड़ी सज़ा दी गई। लेकिन भगवान की कृपा से उन्होंने महान ब्रह्मा के रूप में अपना सम्मान नहीं खोया।
