धर्म ब्रह्मा के सीने से प्रगट हुआ, जहां भगवान नारायण विराजते हैं और अधर्म उनकी पीठ से उत्पन्न हुआ, जहां जीवों के लिए भयानक मौत होती है।
Dharma appeared from Brahma's chest where the Supreme Personality of Godhead Narayana resides and Adharma appeared from his back where a terrible death occurs for the living being.
तात्पर्य
वह धर्म उस स्थान से प्रकट हुआ जहाँ भगवद् व्यक्तित्व स्वयं विराजमान है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि धर्म का अर्थ भगवद् व्यक्तित्व को भक्तिपूर्ण सेवा देना है, जैसा कि भगवद-गीता और भागवतम दोनों में पुष्टि की गई है। भगवद-गीता में अंतिम निर्देश अन्य सभी धार्मिक कार्यों को त्यागने और भगवद् व्यक्तित्व की शरण लेने का है। श्रीमद्-भागवतम भी पुष्टि करता है कि धर्म की सर्वोच्च पूर्णता वह है जो भगवान की भक्तिमय सेवा की ओर ले जाती है, जो भौतिक बाधाओं से अवरुद्ध नहीं होती और न ही उनसे प्रेरित होती है। अपने पूर्ण रूप में धर्म भगवान की भक्तिपूर्ण सेवा है, और अधर्म ठीक इसके विपरीत है। शरीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हृदय है, जबकि पीठ सबसे उपेक्षित हिस्सा है। जब कोई शत्रु द्वारा आक्रमण किया जाता है तो वह पीठ से होने वाले आक्रमणों को सहन करने और छाती पर होने वाले सभी आक्रमणों से सावधानीपूर्वक अपनी रक्षा करने के लिए प्रवृत्त होता है। सभी प्रकार के अधर्म ब्रह्मा की पीठ से उत्पन्न होते हैं, जबकि वास्तविक धर्म, भगवान की भक्तिपूर्ण सेवा, उनकी छाती से उत्पन्न होती है, जहाँ नारायण विराजमान रहते हैं। कोई भी चीज जो भगवान की भक्तिमय सेवा की ओर न ले जाए वह अधर्म है, और जो कुछ भी भगवान की भक्तिमय सेवा की ओर ले जाए उसे धर्म कहा जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥