श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.12.22 
मरीचिरत्र्याङ्गिरसौ पुलस्त्य: पुलह: क्रतु: ।
भृगुर्वसिष्ठो दक्षश्च दशमस्तत्र नारद: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष और दसवें पुत्र नारद का जन्म हुआ।
 
In this way Marichi, Atri, Angira, Pulastya, Pulah, Kratu, Bhrigu, Vashishtha, Daksh and the tenth son Narad were born.
तात्पर्य
ब्रह्मांडीय प्रकटीकरण की सृष्टि, रखरखाव और विघटन की पूरी प्रक्रिया सशर्त आत्माओं को वापस घर, ब्रह्म के पास वापस जाने का मौका देने के लिए है। ब्रह्मा ने अपने रचनात्मक प्रयास में मदद के लिए रुद्र की रचना की, लेकिन शुरू से ही रुद्र पूरी सृष्टि को निगलने लगा और इसलिए उसे ऐसी विनाशकारी गतिविधियों से रोकना पड़ा। इसलिए ब्रह्मा ने अच्छे बच्चों का एक और समूह बनाया, जो ज्यादातर सांसारिक फलदायक गतिविधियों के पक्ष में थे। हालाँकि, वह अच्छी तरह से जानता था कि भगवान की भक्तिमय सेवा के बिना, सशर्त आत्माओं का शायद ही कोई लाभ होता है, और इसलिए अंत में उन्होंने अपने योग्य पुत्र नारद की रचना की, जो सभी पारलौकिकवादियों के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु हैं। भगवान की भक्तिमय सेवा के बिना कोई भी गतिविधि के किसी भी विभाग में प्रगति नहीं कर सकता, हालांकि भक्तिमय सेवा का मार्ग हमेशा किसी भी भौतिक चीज़ से स्वतंत्र होता है। केवल भगवान की दयालु प्रेममय सेवा ही जीवन के वास्तविक लक्ष्य को प्रदान कर सकती है, और इसलिए श्रीमान नारद मुनि द्वारा प्रदान की गई सेवा ब्रह्मा के सभी पुत्रों में सर्वोच्च है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)