ससर्जाग्रेऽन्धतामिस्रमथ तामिस्रमादिकृत् ।
महामोहं च मोहं च तमश्चाज्ञानवृत्तय: ॥ २ ॥
अनुवाद
ब्रह्मा ने सबसे पहले अज्ञानतापूर्ण प्रवृत्तियों को बनाया, जैसे कि स्वयं को धोखा देना, मौत का डर, हताशा के बाद क्रोध, झूठी स्वामित्व की भावना और शरीर के प्रति मोह या अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाना।
Brahma first created the ignorance-filled tendencies of self-deception, sense of death, anger after frustration, false ownership and the deluded bodily concept or forgetfulness of one's true nature.
तात्पर्य
विभिन्न प्रजातियों में जीवों के वास्तविक निर्माण से पहले, ब्रह्मा ने उन परिस्थितियों का निर्माण किया था जिनके आधार पर भौतिक जगत में जीवों को रहना पड़ता है। जब तक जीव अपने वास्तविक अस्तित्व को नहीं भूलता है, तब तक उसके लिए भौतिक परिस्थतियों में रहना असंभव है। अतः भौतिक अस्तित्व की पहली शर्त है अपने वास्तविक अस्तित्व को भूल जाना। और अपने वास्तविक अस्तित्व को भूल जाने से, निश्चित रूप से मृत्यु का भय सताने लगता है, यद्यपि शुद्ध जीव अमर और जन्मरहित है। भौतिक प्रकृति के साथ यह मिथ्या अहंभाव ही उन वस्तुओं के मिथ्या स्वामित्व का कारण है जो श्रेष्ठ नियंत्रण की व्यवस्था द्वारा प्रस्तुत की जाती हैं। सभी भौतिक संसाधन एक जीव को उसके शांतिपूर्ण जीवन और स्थित जीवन में आत्म-साक्षात्कार के कर्तव्यों के निर्वहन के लिए प्रस्तुत किये जाते हैं। किन्तु मिथ्या अहंभाव के कारण, स्थिति आत्मा परमेश्वर की संपत्ति के मिथ्या स्वामित्व की भावना से फँस जाती है। इस श्लोक से यह स्पष्ट है कि ब्रह्मा स्वयं परमेश्वर की एक सृष्टि है, और जो पाँच प्रकार की अविद्या है जो भौतिक अस्तित्व में जीवों की स्थिति निर्धारित करती है, वह ब्रह्मा की सृष्टि है। यह सोचना हास्यास्पद है कि जीव परम सत्ता के बराबर है जबकि कोई यह समझ सकता है कि स्थित आत्माएँ ब्रह्मा के जादू प्रभाव में हैं। पतंजलि ने भी यह स्वीकार किया है कि पाँच प्रकार की अविद्या है, जैसा कि यहाँ वर्णित है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥