तपसैव परं ज्योतिर्भगवन्तमधोक्षजम् ।
सर्वभूतगुहावासमञ्जसा विन्दते पुमान् ॥ १९ ॥
अनुवाद
केवल तपस्या के द्वारा ही उस भगवान् के व्यक्तित्व के पास पहुँचा जा सकता है, जो प्रत्येक जीव के हृदय के भीतर हैं और सभी इन्द्रियों की पहुँच से परे भी हैं।
By mere penance one can reach the Supreme Lord, who resides within the heart of every living being and at the same time is beyond the reach of all the senses.
तात्पर्य
परमात्मा की कृपा प्राप्त करने के लिए तपस्या आवश्यक है, यह उदाहरण अपने पुत्रों और अनुयायियों के सामने प्रस्तुत करने के लिए, ब्रह्मा जी ने रुद्र जी को तपस्या करने का उपदेश दिया। भगवद गीता में कहा गया है कि अधिकांश लोगों की जनता किसी अधिकारी द्वारा दिखाए गए मार्ग का अनुसरण करती है। इस प्रकार ब्रह्मा जी, रुद्र पीढ़ियों से व्यग्र और जनसंख्या के बढ़ने के कारण भक्षण होने के भय के कारण, रुद्र जी को ऐसी अवांछनीय पीढ़ी का उत्पादन रोकने और परमात्मा की कृपा प्राप्त करने के लिए तपस्या ग्रहण करने को कहा। इसलिए हम चित्रों में पाते हैं कि रुद्र जी हमेशा भगवान की कृपा की प्राप्ति के लिए ध्यान में बैठे रहते हैं। अप्रत्यक्ष रूप से, रुद्र जी के पुत्रों और अनुयायियों को रुद्र सिद्धांत का अनुसरण करते हुए विनाश के कार्य को रोकने की सलाह दी जाती है, जबकि ब्रह्मा जी की शांतिपूर्ण रचना चल रही है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥