गृहाणैतानि नामानि स्थानानि च सयोषण: ।
एभि: सृज प्रजा बह्वी: प्रजानामसि यत्पति: ॥ १४ ॥
अनुवाद
हे पुत्र, अब तुम अपने-अपने और अपनी पत्नियों के लिए निर्धारित नाम और स्थानों को स्वीकार करो और चूंकि अब तुम जीवों के स्वामियों में से एक हो, इसलिए तुम व्यापक स्तर पर जनसंख्या वृद्धि कर सकते हो।
O child, now accept the names and places designated for yourself and your wives, and since you are now one of the lords of the living entities, you can increase the population on a large scale.
तात्पर्य
ब्रम्हा, रूद्र के पिता के रूप में, अपने बेटे की पत्नियों, उसके रहने के स्थान, और उसके नाम भी स्वयं चयन करते हैं। यह स्वाभाविक है कि किसी को अपने पिता द्वारा चयनित पत्नी को स्वीकार करना चाहिए, जैसे ही एक पुत्र वह नाम स्वीकार करता है जो पिता द्वारा उसे दिया गया हो या पिता द्वारा दी गई संपत्ति को स्वीकार करता हो। यह दुनिया की जनसंख्या को बढ़ाने का सामान्य तरीका होता है। इसी तरह, कुमारों ने अपने पिता के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था क्योंकि वे विख्यात संख्या में पुत्रों को जन्म देने के व्यवसाय से बेहद उच्च थे। जिस प्रकार एक पुत्र उच्चतर उद्देश्यों के लिए अपने पिता के आदेश को मना कर सकता है, इसी तरह पिता भी अपनी जनसंख्या को बढ़ाने के लिए उच्चतर उद्देश्यों के कारण अपने पुत्रों का निर्वाह करने से मना कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥