श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 12: कुमारों तथा अन्यों की सृष्टि  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.12.11 
हृदिन्द्रियाण्यसुर्व्योम वायुरग्निर्जलं मही ।
सूर्यश्चन्द्रस्तपश्चैव स्थानान्यग्रे कृतानि ते ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
हे बालक, मैंने तुम्हारे निवास के लिए पहले से निम्नलिखित स्थानों का चयन कर लिया है: हृदय, इंद्रियाँ, प्राण वायु, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा और तपस्या।
 
O child, I have already selected the following places for your residence: the heart, the senses, the vital breath, sky, air, fire, water, earth, the sun, the moon and austerity.
तात्पर्य
रुद्र का ब्रह्मा की भृकुटियों के बीच से क्रोध के कारण सृजन बहुत महत्वपूर्ण होता है, जो कि अज्ञानता द्वारा आंशिक रूप से स्पर्श की गई कामना के तरीके से उत्पन्न होता है। भगवद् गीता (3.37) में रुद्र के सिद्धांत का वर्णन किया गया है। क्रोध काम का परिणाम है, जो कामना के तरीके का परिणाम है। जब कामना और तड़प असंतुष्ट होती है, तो क्रोध का तत्व प्रकट होता है, जो कि वातानुकूलित आत्मा का दुर्जेय दुश्मन है। इस पापपूर्ण और शत्रुतापूर्ण जुनून को अहंकार के रूप में दर्शाया गया है, या स्वयं को सभी में सर्वोच्च मानने का झूठा अहंकारी दृष्टिकोण। वातानुकूलित आत्मा की ओर से ऐसा अहंकारी दृष्टिकोण, जो पूरी तरह से भौतिक प्रकृति के नियंत्रण में है, भगवद् गीता में मूर्खतापूर्ण बताया गया है। अहंकार का दृष्टिकोण हृदय में रुद्र सिद्धांत की अभिव्यक्ति है, जिसमें क्रोध उत्पन्न होता है। यह क्रोध हृदय में विकसित होता है और आँखों, हाथों और पैरों जैसी विभिन्न इंद्रियों के माध्यम से प्रकट होता है। जब एक व्यक्ति क्रोधित होता है तो वह लाल-गर्म आंखों से ऐसे क्रोध को व्यक्त करता है और कभी-कभी अपनी मुट्ठी बांधने या अपने पैरों से लात मारने का प्रदर्शन करता है। रुद्र सिद्धांत की यह प्रदर्शनी ऐसे स्थानों में रुद्र की उपस्थिति का प्रमाण है। जब एक व्यक्ति क्रोधित होता है तो वह बहुत तेजी से साँस लेता है, और इस प्रकार रुद्र जीवन की हवा में या साँस लेने की गतिविधियों में प्रदर्शित होता है। जब आकाश घने बादलों से घिर जाता है और क्रोध में दहाड़ता है, और जब हवा बहुत तेजी से चलती है, तो रुद्र सिद्धांत प्रकट होता है, और इसलिए जब समुद्र का पानी हवा से संचालित होता है तो वह रुद्र की उदास विशेषता में प्रकट होता है, जो सामान्य व्यक्ति के लिए बहुत भयानक है। जब आग धधक रही होती है तो हम रुद्र की उपस्थिति का भी अनुभव कर सकते हैं, और जब पृथ्वी पर बाढ़ आती है तो हम समझ सकते हैं कि यह भी रुद्र का प्रतिनिधित्व है। कई सांसारिक जीव हैं जो लगातार रुद्र तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। सांप, बाघ और शेर हमेशा रुद्र के प्रतिनिधि होते हैं। कभी-कभी, सूर्य की अत्यधिक गर्मी के कारण हीटस्ट्रोक के मामले होते हैं, और चंद्रमा द्वारा निर्मित अत्यधिक ठंड के कारण पतन के मामले होते हैं। तपस्या के प्रभाव से युक्त कई ऋषि और कई योगी, दार्शनिक और त्यागी होते हैं जो कभी-कभी क्रोध और काम के रुद्र सिद्धांत के प्रभाव में अपनी अर्जित शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। महान योगी दुर्वासा ने इस रुद्र सिद्धांत के प्रभाव में, महाराजा अम्बरीष के साथ झगड़ा किया, और एक ब्राह्मण लड़के ने महान राजा परीक्षित को शाप देकर रुद्र सिद्धांत का प्रदर्शन किया। जब रुद्र सिद्धांत उन व्यक्तियों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जो भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की भक्ति सेवा में नहीं लगे हुए हैं, तो क्रोधित व्यक्ति अपनी बेहतर स्थिति के शिखर से नीचे गिर जाता है। इसकी पुष्टि इस प्रकार की जाती है:

ये ’अन्ये’रविंदाक्ष विमुक्त-मानिनस

तवय्य अस्ता-भावद अविशुद्ध-बुद्धयाः

आरुह्य कृच्छ्रेण परम पदम ततः

पतंती अधो’नदृत-युष्मद-अंग्रयाः

(भा० 10.2.32)

निर्विशेषवादी का सबसे अधिक पतन सर्वोच्च के साथ एक होने के उसके झूठे और अनुचित दावे के कारण होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)