धर्मश्चतुष्पान्मनुजान् कृते समनुवर्तते ।
स एवान्येष्वधर्मेण व्येति पादेन वर्धता ॥ २१ ॥
अनुवाद
हे विदुर, सत्ययुग में मानव जाति ने धर्म के सिद्धान्तों का पूरी तरह और उचित तरीके से पालन किया। पर जैसे ही दूसरे युगों में और अधिक अधर्म बढ़ता गया, वैसे-वैसे धर्म अपने एक-एक अंग को खोता गया।
O Vidura, in the Satya-yuga the human race followed the principles of Dharma properly and completely, but in other Yugas, as Adharma (irreligion) entered, Dharma gradually diminished part by part.
तात्पर्य
सत्ययुग में धर्म की सम्पूर्ण आज्ञा चलती थी। उसके बाद प्रत्येक युग में धर्म की आज्ञा क्रमशः एक अंश घटती चली गई। अर्थात् अभी एक अंश धर्म और तीन अंश अधर्म है इसलिए इस युग के लोग अधिक सुखी नहीं हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥